दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर विभाग को आदेश दिया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के टैक्स रिटर्न की प्रोसेसिंग रोक दी जाए। यह फैसला जजों को मिलने वाले खास भत्तों पर टैक्स को लेकर चल रहे विवाद के चलते आया है। कोर्ट ने कहा है कि जब तक कानूनी मसला सुलझ नहीं जाता, तब तक टैक्स की मांग और रिफंड पर रोक लगी रहेगी।
जजों के भत्तों पर टैक्स का विवाद
दिल्ली हाईकोर्ट ने आयकर विभाग को एक बड़ा अंतरिम आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) की ऑटोमेटेड प्रोसेसिंग तुरंत रोकी जाए। यह फैसला दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन की ओर से दायर की गई एक याचिका के बाद आया है। एसोसिएशन ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेस (CBDT) के 12 सितंबर 2025 के एक मेमोरेंडम को चुनौती दी है।
विवाद की जड़ क्या है?
असली पेंच जजों को मिलने वाले खास भत्तों, जैसे कि किराया-मुक्त आवास, कन्वेयंस अलाउंस, समप्चुएरी अलाउंस और लीव ट्रैवल कंसेशन, के टैक्स ट्रीटमेंट को लेकर है। CBDT के मेमोरेंडम में इन भत्तों को नए टैक्स रिजीम के तहत टैक्सेबल (Taxable) माना गया था। लेकिन, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ये फायदे 'हाई कोर्ट जजेज (सैलरीज एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) एक्ट, 1954' और 'सुप्रीम कोर्ट जजेज (सैलरीज एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस) एक्ट, 1958' के तहत कानूनी रूप से सुरक्षित हैं और इनकम कंप्यूटेशन से एग्जम्प्ट (Exempt) हैं। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, ये एक्ट इनकम टैक्स एक्ट से ऊपर हैं।
कोर्ट का एडमिनिस्ट्रेटिव आदेश
इस कानूनी लड़ाई के चलते कोर्ट ने कुछ खास एडमिनिस्ट्रेटिव निर्देश भी दिए हैं। आयकर विभाग ने कोर्ट को बताया था कि उनका इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेसिंग सिस्टम जजों जैसे खास टैक्सपेयर्स को मैन्युअल इंटरवेंशन के बिना अलग नहीं कर पाता। इस समस्या को हल करने के लिए, कोर्ट ने जजों के प्राइवेट सेक्रेटरी को 18 अगस्त 2026 तक अपनी ज़रूरी जानकारी, जिसमें पैन (PAN) भी शामिल है, टैक्स अथॉरिटीज को सबमिट करने का आदेश दिया है।
आगे क्या?
यह मामला टैक्सपेयर्स और एडमिनिस्ट्रेशन के लिए एक अहम केस है। यह दिखाता है कि कैसे पुराने, सेक्टर-स्पेसिफिक एग्जम्प्शन को नए, सिंप्लिफाइड टैक्स रिजीम के साथ अलाइन करना एक चुनौती हो सकती है। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि प्रोसेसिंग के बाद जो भी टैक्स डिमांड (Tax Demand) उठाई जाएगी, उसे होल्ड पर रखा जाए और जब तक याचिका पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक कोई भी रिफंड जारी नहीं किया जाएगा। अगर कोई रिफंड पहले ही प्रोसेस हो चुका है, तो वह भी कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।
टैक्स प्रोफेशनल्स और इन्वेस्टर्स इस केस पर नजर रख सकते हैं, क्योंकि यह टैक्स फाइलिंग में लीगल एग्जम्प्शन की व्याख्या पर असर डाल सकता है। हालाँकि यह मामला जजों के भत्तों से जुड़ा है, लेकिन इसका नतीजा यह स्पष्ट करेगा कि कैसे खास लेजिस्लेटिव सुरक्षाएं आम टैक्स नियमों के साथ इंटरैक्ट करती हैं। 18 अगस्त की डेडलाइन और आगे की सुनवाईयां इस मामले में महत्वपूर्ण होंगी।
