दिल्ली HC का बड़ा फैसला: जजों के ITR प्रोसेसिंग पर रोक, टैक्स विवाद का मामला

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AuthorNeha Patil|Published at:
दिल्ली HC का बड़ा फैसला: जजों के ITR प्रोसेसिंग पर रोक, टैक्स विवाद का मामला

दिल्ली हाईकोर्ट ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) की प्रोसेसिंग फिलहाल रोकने का आदेश दिया है। यह अंतरिम आदेश एक कानूनी विवाद के बाद आया है, जिसमें यह तय होना है कि क्या नए इनकम टैक्स रिजीम के तहत कुछ खास ज्यूडिशियल अलाउंस (judicial allowances) टैक्स-फ्री रहेंगे। इस फैसले का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जब तक मामले की जांच-पड़ताल न हो जाए, तब तक ऑटोमेटेड टैक्स सिस्टम इन अलाउंस को टैक्सेबल इनकम न माने।

जजों के ITR पर क्यों लगी रोक?

दिल्ली हाईकोर्ट ने टैक्स अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) की प्रोसेसिंग तत्काल रोक दें। यह फैसला हाल ही में दायर एक कानूनी याचिका के बाद आया है, जिसमें नए इनकम टैक्स रिजीम के तहत ज्यूडिशियल अलाउंस की टैक्सेबिलिटी (taxability) पर सवाल उठाया गया है।

जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता की बेंच ने दिल्ली टैक्स बार एसोसिएशन की याचिका पर यह निर्देश जारी किया। इस मामले की जड़ें इनकम-टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 115BAC (जो नए टैक्स रिजीम को नियंत्रित करता है) और हाई कोर्ट जजेज (सैलरी और सर्विस कंडीशंस) एक्ट, 1954 व सुप्रीम कोर्ट जजेज (सैलरी और सर्विस कंडीशंस) एक्ट, 1958 की व्याख्या पर टिकी हैं।

CBDT के मेमोरेंडम पर विवाद

मुख्य विवाद सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (CBDT) द्वारा सितंबर 2025 में जारी एक मेमोरेंडम को लेकर है। इस मेमोरेंडम में कहा गया था कि कुछ ज्यूडिशियल अलाउंस, जैसे कि बिना किराए का आवास (rent-free accommodation), कन्वेंस (conveyance) और समप्चरी अलाउंस (sumptuary allowances), के टैक्स लाभ केवल पुराने टैक्स रिजीम के तहत ही मान्य हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ये अलाउंस महज छूट (exemption) नहीं, बल्कि वैधानिक बहिष्कार (statutory exclusions) हैं, जिसका मतलब है कि टैक्स रिजीम चाहे जो भी हो, इन्हें जज की टैक्सेबल इनकम का हिस्सा नहीं माना जाना चाहिए।

ऑटोमेटेड सिस्टम से बचाव

हाईकोर्ट ने ऑटोमेटेड टैक्स सिस्टम (automated tax systems) से जुड़ी चिंताओं के कारण प्रोसेसिंग रोकने का फैसला किया। अगर यह न्यायिक हस्तक्षेप न होता, तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के ऑटोमेटेड सिस्टम संभवतः रिटर्न को उसी तरह प्रोसेस करते जैसे फाइल किए गए हैं, जिससे विवादित अलाउंस को टैक्सेबल इनकम मान लिया जाता। इस स्टे (stay) के जरिए, कोर्ट का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि अंतिम फैसला आने तक यथास्थिति (status quo) बनी रहे, ताकि जजों को किसी भी तरह के टैक्स डिमांड या बाद में सुधार की जरूरत से बचाया जा सके, खासकर यदि कोर्ट याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाता है।

आगे क्या?

इस अंतरिम आदेश के तहत, जजों को अपने रिटर्न फाइल करने या संशोधित करने की अनुमति होगी, और वे इन अलाउंस को नॉन-टैक्सेबल (non-taxable) मान सकेंगे। इसे सुविधाजनक बनाने के लिए, कोर्ट ने जजों के प्राइवेट सेक्रेटरी को निर्देश दिया है कि वे जरूरी परमानेंट अकाउंट नंबर (PAN) और फाइलिंग डिटेल्स टैक्स अथॉरिटीज को दें, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इन विशेष रिटर्न की प्रोसेसिंग ऑटोमेटेड तरीके से न हो और वे रोकी जा सकें।

इस मामले का नतीजा एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करेगा कि क्या विशेष न्यायिक कानून, इनकम-टैक्स एक्ट के सामान्य प्रावधानों पर हावी हो सकते हैं। अगली सुनवाई 3 सितंबर, 2026 को निर्धारित है। जब तक कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक प्रभावित ज्यूडिशियरी के सदस्यों के टैक्स रिटर्न होल्ड पर रहेंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.