Digital News Publishers Association (DNPA) ने DPDP Act को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। पत्रकारों और मीडिया घरानों को डर है कि इस कानून के सख्त नियमों से खोजी पत्रकारिता और डिजिटल आर्काइव्स पर बुरा असर पड़ सकता है। कोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर **17 नवंबर, 2026** को सुनवाई की तारीख तय की है।
कानून में क्या है पेंच?
DNPA, जो भारत के 21 बड़े मीडिया संस्थानों का प्रतिनिधित्व करता है, ने DPDP Act 2023 और इसके 2025 के नियमों को कोर्ट में चुनौती दी है। मुख्य आपत्ति यह है कि कानून में पत्रकारिता के लिए कोई स्पष्ट छूट (Exemption) नहीं दी गई है। मीडिया घरानों का मानना है कि 'कमर्शियल-ग्रेड कंसेंट' की शर्तें पब्लिक-इंटरेस्ट जर्नलिज्म के लिए व्यावहारिक नहीं हैं। अगर पत्रकारों को जांच के दौरान किसी व्यक्ति से सहमति लेनी पड़ी, तो इससे इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट्स के लीक होने या डेटा डिलीट करवाने का खतरा बना रहेगा।
ऑपरेश्नल रिस्क और जुर्माना
मीडिया कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चिंता 'राइट टू इरेजर' (Right to Erasure) को लेकर है। कानून के उल्लंघन पर ₹250 करोड़ तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है, जो मीडिया सेक्टर के लिए बड़ा फाइनेंशियल रिस्क बन सकता है। इसके अलावा, कानून की 'धारा 36' पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिससे सरकार को जानकारी मांगने का अधिकार मिलता है—प्रकाशकों को डर है कि इससे उनके गोपनीय सूत्रों (Confidential Sources) की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
सरकार का रुख और आगे की राह
केंद्रीय IT मंत्री अश्विनी वैष्णव ने स्पष्ट किया है कि सरकार का प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने का कोई इरादा नहीं है और वे जरूरी बदलावों पर चर्चा के लिए तैयार हैं। अब सभी की निगाहें 17 नवंबर, 2026 की सुनवाई पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स के लिए डेटा सुरक्षा का नया ढांचा क्या होगा।
