कलकत्ता HC का बड़ा फैसला: फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) बच्चों के मंथली मेंटेनेंस का विकल्प नहीं

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AuthorMehul Desai|Published at:
कलकत्ता HC का बड़ा फैसला: फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) बच्चों के मंथली मेंटेनेंस का विकल्प नहीं

कलकत्ता हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि बच्चों के नाम पर फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) खोल देना माता-पिता को मासिक भरण-पोषण (मेंटेनेंस) देने से नहीं बचाता। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय के लिए बचत (Savings) का मकसद बच्चों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना नहीं है। यह फैसला ऐसे माता-पिता के लिए अहम है जो कानूनी अलगाव के दौरान अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों को निभा रहे हैं, और यह सुनिश्चित करता है कि बच्चे की तात्कालिक जरूरतों को प्राथमिकता दी जाए।

बचत और रोजमर्रा के खर्चों में अंतर

कलकत्ता हाईकोर्ट ने तलाक के मामलों में माता-पिता की वित्तीय जिम्मेदारियों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। पॉलामी ताराफदार (साहा) बनाम दिबेश साहा के मामले में, कोर्ट ने एक मजिस्ट्रेट के 2022 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें पिता को बच्चे के लिए मासिक मेंटेनेंस के बदले ₹11 लाख की FD कराने की इजाजत दी गई थी।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और अन्य लंबी अवधि के निवेश बच्चों की भविष्य की सुरक्षा, जैसे शिक्षा या बड़े जीवन के पड़ाव के लिए होते हैं। लेकिन, इन निवेशों का इस्तेमाल बच्चों की रोजमर्रा की जरूरतों, जैसे खाना, स्कूल फीस और स्वास्थ्य देखभाल, को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि मासिक मेंटेनेंस और लंबी अवधि का निवेश दो अलग-अलग वित्तीय जिम्मेदारियां हैं जिनके कार्य अलग-अलग हैं।

यह अंतर उन माता-पिता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो वित्तीय समझौते कर रहे हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि एक तरफ मासिक मेंटेनेंस की मांग करना और दूसरी तरफ बड़ी FD बनाए रखने के लिए मजबूर करना बहुत भारी हो सकता है, लेकिन एक दूसरे की जगह नहीं ले सकता। मामले को अब मजिस्ट्रेट के पास नए सिरे से सुनवाई के लिए भेजा गया है ताकि बच्चे की वास्तविक आवर्ती लागतों को ध्यान में रखते हुए उचित मेंटेनेंस राशि तय की जा सके।

वित्तीय योजना पर असर

वित्तीय समझौतों से गुजर रहे परिवारों के लिए, यह फैसला स्पष्ट हिसाब-किताब के महत्व को रेखांकित करता है। पर्सनल फाइनेंस एक्सपर्ट्स अक्सर कहते हैं कि मेंटेनेंस एक वर्तमान खर्च है, जैसे घर का बिजली का बिल, जबकि निवेश पूंजीगत संपत्ति हैं। जब इन दोनों को मिलाया जाता है, तो यह कानूनी विवादों को जन्म दे सकता है या इस मामले की तरह, ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जहां बैंक में पैसा होने के बावजूद बच्चे की तत्काल नकदी की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं।

कोर्ट ने अंतरिम तौर पर मां को बच्चे के वर्तमान भरण-पोषण के लिए मौजूदा FD से ब्याज निकालने की अनुमति दे दी है। यह फैसला दर्शाता है कि अदालतें बच्चों की तत्काल भलाई को ऐसे निवेश योजनाओं पर प्राथमिकता देंगी जो दैनिक जीवन के लिए नकदी प्रदान नहीं करती हैं।

आगे क्या ध्यान रखें

यह मामला अब मजिस्ट्रेट के पास सुनवाई के लिए वापस जाएगा। ऐसी ही परिस्थितियों में फंसे माता-पिता के लिए, मुख्य सीख यह है कि बच्चों के वास्तविक मासिक खर्चों का विस्तृत रिकॉर्ड रखना आवश्यक है। अदालतें उचित समर्थन राशि तय करने के लिए आय, संपत्ति और देनदारियों जैसे वित्तीय खुलासों पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं। दैनिक खर्चों का सटीक रिकॉर्ड बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना कि समझौता समझौतों में तत्काल मेंटेनेंस और लंबी अवधि के निवेश के बीच स्पष्ट अंतर हो, लंबे कानूनी विवादों से बचने और यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है कि बच्चे की जरूरतें प्रभावी ढंग से पूरी हों।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.