सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (CVC) की नई रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। CBI द्वारा जांच किए जा रहे **7,229** भ्रष्टाचार के मामले अभी भी निचली अदालतों में पेंडिंग हैं। इनमें से कई केस तो **20 साल** से ज्यादा समय से अटके हुए हैं, जिससे बैंकिंग और कॉरपोरेट सेक्टर में अनिश्चितता का माहौल है।
कानूनी बाधा और आर्थिक असर
CVC की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कानूनी और जांच ढांचे में पेंडेंसी एक बड़ी समस्या बनकर उभरी है। 7,229 केसों का पेंडिंग होना न केवल न्यायिक प्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। अक्सर भ्रष्टाचार के ये मामले बड़े फाइनेंशियल फ्रॉड से जुड़े होते हैं, जिनका असर सीधे बैंकिंग सेक्टर पर पड़ता है।
दशकों से अटके हैं मामले
आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं: लगभग 35% केस पिछले 10 सालों से पेंडिंग हैं। सबसे खराब स्थिति 409 ऐसे मामलों की है, जो ट्रायल के स्टेज पर 20 साल से भी ज्यादा समय से अटके हुए हैं। समस्या केवल निचली अदालतों तक सीमित नहीं है; हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी 14,083 अपील्स और रिट याचिकाएं फंसी हुई हैं, जिनमें से 739 मामले तो दो दशक पुराने हैं।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या है रिस्क?
इन्वेस्टर्स और मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए ये देरी चिंता का विषय है क्योंकि ये सीधे तौर पर लोन फ्रॉड और कॉरपोरेट गवर्नेंस फेलियर के निपटारे को प्रभावित करती है। जब किसी बड़ी कंपनी या पब्लिक सेक्टर एंटिटी के खिलाफ केस सालों-साल खिंचते हैं, तो मार्केट में अनिश्चितता का माहौल बनता है। CBI के पास वर्तमान में 473 केस एक्टिव जांच में हैं और केवल 2025 में ही 1,005 नए केस रजिस्टर किए गए हैं।
निवेशकों के लिए एसेट रिकवरी और बैंकों के बैड लोन (Non-Performing Loans) की रिकवरी की रफ्तार ही मुख्य मॉनिटरिंग पॉइंट है। इन कानूनी सुधारों पर नजर रखना जरूरी है ताकि पता चल सके कि भविष्य में रेगुलेटरी वातावरण में कितनी पारदर्शिता आती है।
