CJI Surya Kant ने कानून की पढ़ाई को और अधिक प्रैक्टिकल बनाने के लिए **4 साल** के डिग्री कोर्स का सुझाव दिया है। चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में उन्होंने अनिवार्य अप्रेंटिसशिप और न्यायिक नियुक्तियों में गोपनीयता पर भी खुलकर बात की।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) Surya Kant ने हाल ही में पटना की चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने कानून की शिक्षा में सुधार, न्यायिक जवाबदेही और नागरिक अधिकारों जैसे गंभीर मुद्दों पर अपनी राय रखी।\n\n### शिक्षा में बड़ा बदलाव: थ्योरी से ज्यादा प्रैक्टिकल पर जोर\n\nCJI और वाइस चांसलर Faizan Mustafa का मानना है कि वर्तमान 5-वर्षीय इंटीग्रेटेड लॉ कोर्स को आधुनिक बनाने की जरूरत है। इस नई प्रस्तावित योजना के तहत एकेडमिक पढ़ाई को 4 साल में समेटा जाएगा, जबकि आखिरी साल पूरी तरह से कोर्ट अप्रेंटिसशिप के लिए आरक्षित होगा। यह बदलाव कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए काफी अहम है, क्योंकि इससे उद्योग जगत को ऐसे कानूनी जानकार मिलेंगे जो सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि अदालत के कामकाज से भी वाकिफ होंगे। इससे ट्रेनिंग का समय घटेगा और नए वकीलों की कार्यक्षमता बढ़ेगी।\n\n### कॉलेजियम सिस्टम और पारदर्शिता\n\nन्यायिक नियुक्तियों में गोपनीयता को लेकर उठ रहे सवालों पर CJI ने अपना पक्ष साफ किया है। उन्होंने कहा कि नियुक्तियों में 'पूर्ण पारदर्शिता' कभी-कभी उम्मीदवारों की साख को गलत तरीके से नुकसान पहुंचा सकती है, खासकर तब जब किसी नकारात्मक फीडबैक को समय से पहले सार्वजनिक कर दिया जाए। उनका मानना है कि संस्थागत गरिमा बनाए रखना न्यायिक स्थिरता के लिए जरूरी है।\n\n### मौलिक अधिकारों के प्रति स्पष्ट रुख\n\nछात्रों के विरोध प्रदर्शन और प्रशासनिक कार्यवाही पर CJI ने कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की ज्यादती पर कोर्ट हस्तक्षेप करने के लिए तैयार है। यह स्पष्टता देश में एक संतुलित कानूनी माहौल बनाने के लिए अहम है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि जनहित और व्यक्तिगत गरिमा के बीच संतुलन बना रहे।
