Disha Salian की मौत के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। जस्टिस एस.वी. कोतवाल और जस्टिस आर.आर. भोसले की बेंच ने एफआईआर (FIR) दर्ज न करने और फॉरेंसिक प्रोटोकॉल में कमियों को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने साल 2020 में हुई दिशा सालियन की मौत के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली की समीक्षा शुरू कर दी है। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष से पूछा है कि परिवार के आरोपों के बावजूद अब तक एफआईआर (FIR) क्यों नहीं दर्ज की गई और केवल एक्सीडेंटल डेथ रिपोर्ट (ADR) के आधार पर मामला क्यों चल रहा है।
जांच प्रक्रिया में तकनीकी खामियां
कोर्ट ने जांच की विश्वसनीयता पर कई तकनीकी सवाल उठाए हैं। मुख्य चिंता फॉरेंसिक प्रोटोकॉल को लेकर है। जजों ने गौर किया कि पोस्टमार्टम केवल एक मेडिकल प्रोफेशनल द्वारा किया गया था, जबकि राज्य के दिशानिर्देशों के अनुसार इसके लिए दो डॉक्टरों का होना अनिवार्य है। इसके अलावा, कोर्ट ने सीसीटीवी फुटेज की अनुपलब्धता और गवाहों के बयानों में विसंगतियों की ओर भी इशारा किया है।
न्याय और साक्ष्य पर जोर
न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया है कि यह कानूनी प्रक्रिया राजनीतिक शोर से दूर होनी चाहिए। घटना के 6 साल बाद भी जांच की स्थिति स्पष्ट न होना कानून के समक्ष अनिश्चितता पैदा करता है। यह मामला सतीश सालियन की याचिका पर सुना जा रहा है, जो अपनी बेटी की मौत की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। कोर्ट का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच पूरी तरह से कानूनी प्रोटोकॉल के दायरे में हो और ठोस साक्ष्यों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके।
