Bombay High Court की नागपुर बेंच ने जबरन धर्मांतरण के आरोपी चार लोगों पर चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2025 की घटनाओं पर 'Maharashtra Freedom of Religion Act, 2026' के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि यह कानून अगस्त 2026 में लागू हुआ था।
कोर्ट का तार्किक फैसला\n\nजस्टिस M.W. Chandwani की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले में दर्ज FIR और चार्जशीट को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार के पास इन आपराधिक आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं थे। साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।\n\n### कानून का बैक-डेट में इस्तेमाल नहीं\n\nफैसले का मुख्य बिंदु घटना का समय है। कथित घटना 2025 की है, जबकि महाराष्ट्र में धर्मांतरण विरोधी कानून 28 अगस्त, 2026 को लागू हुआ था। कोर्ट ने साफ कर दिया कि किसी भी कानून को पुरानी तारीख (Retrospective) से लागू करके सजा नहीं दी जा सकती। इसके अलावा, सरकारी अभियोजन पक्ष कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए अनिवार्य सरकारी मंजूरी (Sanction) प्राप्त करने में भी विफल रहा।\n\n### सेक्टर पर क्या होगा असर?\n\nयह कानून फिलहाल हाई कोर्ट में संवैधानिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। 'Allurement' (प्रलोभन) की व्यापक परिभाषा को लेकर पहले ही चिंताएं जताई जा रही हैं। चैरिटेबल ट्रस्ट, शैक्षिक संस्थानों और सामाजिक कल्याण संस्थाओं के लिए यह नियामक अनिश्चितता (Regulatory Uncertainty) का विषय है। निवेशकों और सेक्टर पर नजर रखने वालों के लिए अब कोर्ट की आगे की व्याख्याएं और संभव संशोधन काफी अहम होंगे, क्योंकि ये भविष्य में कानून के लागू होने के तरीके को प्रभावित कर सकते हैं।