Freedom of Religion Act 2026: बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरकरार रखा कानून, शादी के लिए धर्म परिवर्तन पर सख्त

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Freedom of Religion Act 2026: बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरकरार रखा कानून, शादी के लिए धर्म परिवर्तन पर सख्त

बॉम्बे हाई कोर्ट ने Freedom of Religion Act, 2026 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल शादी के उद्देश्य से किया गया धर्म परिवर्तन स्वीकार्य नहीं है और मौजूदा रेगुलेटरी फ्रेमवर्क लागू रहेगा।

चीफ जस्टिस महेश सी. त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की बेंच ने Freedom of Religion Act, 2026 के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने ऑब्जर्वेशन में साफ कर दिया है कि संविधान भले ही अपने धर्म का पालन करने की आजादी देता है, लेकिन राज्य सरकार के पास जबरदस्ती, धोखाधड़ी या लालच देकर कराए गए धर्मांतरण को रेगुलेट करने का पूरा अधिकार है।

कानूनी पेंच और कोर्ट की टिप्पणी

याचिकाकर्ता ने कानून में अनिवार्य 60 दिनों के नोटिस पीरियड और धर्मांतरण की परिभाषा को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन करते हैं। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि याचिका में किसी भी ठोस सबूत या व्यक्तिगत परेशानी का जिक्र नहीं था। इसे 'अकादमिक चुनौती' मानते हुए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को छूट दी कि वे चाहें तो भविष्य में ठोस आधार के साथ दोबारा याचिका दायर कर सकते हैं।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल, इस फैसले के बाद महाराष्ट्र में धर्मांतरण से संबंधित कानून के सभी प्रावधान ज्यों के त्यों लागू रहेंगे। निवेशकों और कानूनी जानकारों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि राज्य का रेगुलेटरी एनवायरनमेंट स्थिर है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि स्वैच्छिक चुनाव और बाहरी दबाव में किए गए धर्म परिवर्तन के बीच का अंतर इस कानून का मुख्य आधार है। जब तक कोई नई चुनौती या साक्ष्य आधारित याचिका दायर नहीं होती, तब तक यह कानून पूरी तरह प्रभावी रहेगा।

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