भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने बॉम्बे हाई कोर्ट से 2020 की एक लंबित याचिका को बंद करने की गुहार लगाई है। माल्या का दावा है कि बैंकों का **₹15,000 करोड़** का कर्ज़ वसूला जा चुका है, जो मूल दावे **₹6,203 करोड़** से कहीं ज़्यादा है। कोर्ट ने अगली सुनवाई **9 सितंबर, 2026** तक टाल दी है और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को वसूली के दावों का सत्यापन करने का आदेश दिया है।
क्या विजय माल्या को मिलेगी राहत?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को निर्देश दिया है कि वे विजय माल्या द्वारा 2020 से लंबित एक कानूनी मामले को बंद करने की अर्जी पर अपना जवाब दाखिल करें। मंगलवार, 13 अगस्त, 2026 को हुई सुनवाई के दौरान, माल्या के वकीलों ने तर्क दिया कि इस केस से जुड़ी नागरिक देनदारी का समाधान हो गया है। उनका कहना है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के नेतृत्व वाले बैंकों के कंसोर्टियम ने जब्त की गई संपत्तियों की बिक्री से लगभग ₹15,000 करोड़ की वसूली की है। बचाव पक्ष के अनुसार, यह रकम मूल ऋण ₹6,203 करोड़ (जिसमें ब्याज भी शामिल था) से काफी ज़्यादा है।
कोर्ट की नरमी या सख्ती?
जस्टिस मिलिंद जाधव की बेंच ने स्पष्ट किया है कि ED अपना पक्ष साफ नहीं करती, तब तक याचिका पर आगे नहीं बढ़ा जाएगा। कोर्ट ने पुरानी लंबित याचिकाओं को निपटाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, लेकिन यह भी साफ किया कि वर्तमान कार्यवाही केवल मामले के नागरिक और व्यावसायिक पहलुओं तक ही सीमित है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस अर्जी की समीक्षा करने का मतलब माल्या के सेटलमेंट के दावों को स्वीकार करना नहीं है, और न ही इसका किसी अलग आपराधिक कार्यवाही या भगोड़ा आर्थिक अपराधी के तौर पर उनकी स्थिति पर कोई असर पड़ेगा।
मामला क्या है?
यह कानूनी विवाद 2019 के एक सेशन कोर्ट के आदेश से जुड़ा है, जिसने कर्जदार बैंकों को माल्या की जब्त की गई संपत्तियों का इस्तेमाल करके अपना बकाया वसूलने की अनुमति दी थी। माल्या ने 2020 की शुरुआत में इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। उनके प्रतिनिधियों का तर्क है कि चूंकि बड़ी रकम की वसूली हो चुकी है, इसलिए इन संपत्तियों से जुड़े कानूनी विवाद को एक व्यावसायिक मामला मानकर अंतिम रूप से सुलझाया जाना चाहिए।
अगली सुनवाई कब?
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 9 सितंबर, 2026 के लिए तय की है। उस तारीख तक, ED से उम्मीद की जाती है कि वह एक एफिडेविट दाखिल करके वास्तविक वसूली की स्थिति और समाधान प्रक्रिया की पुष्टि करेगी। इन विवरणों की समीक्षा के बाद ही कोर्ट यह तय करेगा कि क्या कंसोर्टियम के अन्य बैंकों को नोटिस जारी कर केस बंद करने के अनुरोध का मूल्यांकन करना उचित होगा।
