गोवा में वोटर्स के नाम वोटर लिस्ट से गायब होने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। मामला 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) प्रक्रिया से जुड़ा है, जहां चुनाव आयोग (ECI) ने इसे नए सिरे से तैयारी बताया है।
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच, जिसके जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित जामदार इस मामले की सुनवाई कर रहे हैं, ने चुनावी सूची से नाम हटने की याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है। यह पूरा विवाद गोवा में हुए 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के दौरान सामने आया, जब कई नागरिकों ने पाया कि उनका नाम ड्राफ्ट लिस्ट से नदारद है।
चुनाव आयोग का कानूनी रुख
सुनवाई के दौरान, इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) ने इस प्रक्रिया को 'स्पेशल समरी रिवीजन' (SSR) से अलग बताया। आयोग का तर्क है कि SSR में पुराने रिकॉर्ड अपडेट किए जाते हैं, जबकि SIR में पूरी प्रक्रिया 'डी नोवो' (De Novo) यानी बिल्कुल नए सिरे से होती है। आयोग का कहना है कि ड्राफ्ट लिस्ट में नाम न होने को 'डिलीशन' नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह डेटाबेस को पूरी तरह से रीस्टार्ट करने जैसा है।
प्रशासनिक चुनौतियां और याचिकाकर्ताओं का पक्ष
सेंट क्रूज निर्वाचन क्षेत्र के एक परिवार सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने प्रशासनिक कमियों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने दलील दी कि 'फॉर्म 8' भरने के बावजूद उनके आवेदन समय पर प्रोसेस नहीं किए गए। याचिकाकर्ताओं के वकीलों का कहना है कि आवेदनों का रिजेक्शन और आपत्तियों की सख्त डेडलाइन के कारण कई पात्र नागरिक चुनावी प्रक्रिया से बाहर हो गए हैं।
गवर्नेंस और आने वाला फैसला
यह केस सरकारी डेटा मैनेजमेंट में आने वाली तकनीकी दिक्कतों को उजागर करता है। इसी तरह के एक अन्य प्रशासनिक अपडेट में, ECI ने महाराष्ट्र की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के लिए क्लेम और आपत्तियों की तारीख 26 अक्टूबर, 2026 तक बढ़ा दी है, जो नागरिक अधिकारों के प्रति संतुलन बनाने की कोशिश को दिखाता है। अब सबकी निगाहें कोर्ट के उस फैसले पर टिकी हैं, जिससे यह साफ होगा कि क्या आयोग की यह 'फ्रेश-स्टार्ट' पद्धति नागरिकों के डेटा सुरक्षा के पर्याप्त उपाय सुनिश्चित करती है या नहीं।
