बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की उस नीति को रद्द कर दिया है जिसमें मैनुअल स्कैवेंजिंग के दौरान मौत होने पर मुआवजा देने की जिम्मेदारी प्राइवेट एम्प्लॉयर्स पर डाल दी गई थी। कोर्ट ने अब राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वे पीड़ितों के परिवारों को तुरंत **₹30 लाख** का भुगतान करें।
कोर्ट का बड़ा फैसला
बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की उन 2019 और 2025 की सरकारी नीतियों को खारिज कर दिया है, जिनके तहत खतरनाक सफाई कार्यों के दौरान होने वाली मौतों का मुआवजा प्राइवेट एम्प्लॉयर्स या हाउसिंग सोसायटियों को देना पड़ता था। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की बेंच ने स्पष्ट किया कि अब राज्य सरकार को पीड़ित परिवारों को तुरंत ₹30 लाख का मुआवजा देना होगा।
सरकार के लिए रिकवरी का रास्ता खुला
हालांकि सरकार को मुआवजा तुरंत जारी करना होगा, लेकिन कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि राज्य प्रशासन बाद में इन पैसों की रिकवरी उन प्राइवेट एम्प्लॉयर्स या सोसायटियों से कर सकता है, जो इस काम के लिए जिम्मेदार थे। इस निर्णय का उद्देश्य परिवारों को लंबी कानूनी लड़ाई से बचाना और उन्हें तुरंत आर्थिक राहत पहुंचाना है।
क्यों लिया गया यह फैसला?
यह फैसला 'श्रमिक जनता संघ' की याचिकाओं पर आया है। कोर्ट ने माना कि प्राइवेट एंटिटीज पर मुआवजा थोपने से पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती थी और यह संवैधानिक समानता के अधिकार का उल्लंघन था। बेंच ने जोर देकर कहा कि प्रशासनिक सुविधा से ज्यादा जरूरी सुरक्षा कानूनों का पालन और मानवीय आधार है।
6 महीने का समय
कोर्ट ने राज्य सरकार को ऐसे सभी मामलों की पहचान करने और मुआवजे का भुगतान करने के लिए 6 महीने की समय सीमा दी है। यह फैसला 'प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एज़ मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट, 2013' के तहत सरकारी जवाबदेही को और मजबूत करता है, जिससे अब राज्य के नीति-निर्माताओं को अधिक सख्ती से कानूनों का पालन करना होगा।
