Allahabad High Court: कस्टोडियल वायलेंस 'सरकारी ड्यूटी' नहीं, पुलिस को नहीं मिलेगा कानूनी संरक्षण

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AuthorAditya Rao|Published at:
Allahabad High Court: कस्टोडियल वायलेंस 'सरकारी ड्यूटी' नहीं, पुलिस को नहीं मिलेगा कानूनी संरक्षण

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि कस्टोडियल वायलेंस (हिरासत में हिंसा) के आरोपी पुलिसकर्मी इसे अपनी 'सरकारी ड्यूटी' बताकर कानूनी छूट का दावा नहीं कर सकते।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि हिरासत में हिंसा, छेड़छाड़ और अवैध मारपीट जैसे कृत्य पुलिस की आधिकारिक ड्यूटी के दायरे में नहीं आते हैं। जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने बांदा के बबेरू पुलिस स्टेशन में 2022 में हुई घटना के आरोपी पुलिसकर्मियों की डिस्चार्ज याचिका को खारिज कर दिया है।

क्या था कानूनी पेंच?

यह विवाद क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की सेक्शन 197 की व्याख्या पर टिका था। इस कानून के तहत सरकारी कर्मचारी अक्सर यह दलील देते हैं कि उन्होंने जो भी किया, वह ड्यूटी के दौरान किया, जिसके लिए उन पर मुकदमा चलाने से पहले सरकार की मंजूरी जरूरी है। आरोपी पुलिसकर्मियों ने भी यही सुरक्षा मांगी थी, जिसे कोर्ट ने यह कहते हुए ठुकरा दिया कि शारीरिक हिंसा और डराना-धमकाना जैसे कुकृत्य किसी भी हाल में 'पब्लिक ड्यूटी' नहीं माने जा सकते।

अब आगे क्या होगा?

कोर्ट के इस रुख से अब आरोपी पुलिसकर्मियों पर बिना किसी सरकारी मंजूरी के आपराधिक मुकदमा चलने का रास्ता साफ हो गया है। यह मामला 2022 में पादरी गांव में हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़ा है, जिसमें हिरासत में लिए गए लोगों के साथ गंभीर दुर्व्यवहार के आरोप लगे थे। अब ट्रायल में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं के तहत दंगा करने, जानबूझकर चोट पहुंचाने और आपराधिक धमकी देने जैसे आरोपों पर सुनवाई होगी।

यह फैसला न केवल उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था के लिए एक मिसाल है, बल्कि यह भी स्थापित करता है कि आपराधिक व्यवहार को किसी भी सूरत में कानूनी कवच नहीं मिल सकता।

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