इलाहाबाद हाई कोर्ट ने Law Commission of India को POCSO Act की समीक्षा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट का मानना है कि सख्त कानूनों के कारण कई बार किशोर जोड़ों और उनके परिवारों पर अनुचित असर पड़ता है, जिसके लिए सजा में नरमी और कम्युनिटी सर्विस जैसे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने POCSO Act के मौजूदा प्रावधानों पर गंभीर टिप्पणी करते हुए Law Commission of India को इसके रिव्यू के लिए निर्देश दिए हैं। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (habeas corpus petition) की सुनवाई के दौरान यह अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि कानून की सख्त व्याख्या कभी-कभी न्याय देने के बजाय ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।\n\n### सामाजिक हकीकत और कानूनी पेच\nकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि देश के कई हिस्सों में अशिक्षा और कानूनी जागरूकता की कमी के कारण किशोर जोड़े अक्सर शादी कर लेते हैं और परिवार बना लेते हैं। ऐसे मामलों में POCSO Act की कड़ी धाराएं लागू करने से उनका बसा-बसाया परिवार उजड़ जाता है। बेंच ने कहा कि केवल कानूनी प्रक्रिया का पालन करने के बजाय व्यक्तिगत परिस्थितियों को देखना भी जरूरी है।\n\n### सजा में लचीलेपन की सिफारिश\nकोर्ट ने सुझाव दिया है कि स्पेशल जजों को सजा तय करते समय अधिक विवेक (discretion) का अधिकार मिलना चाहिए। मौजूदा अनिवार्य सजा के प्रावधानों के बजाय, जजों को यह छूट होनी चाहिए कि वे हर केस की मेरिट को समझें, खासकर तब जब उन जोड़ों की संतानें भी हों।\n\n### कम्युनिटी सर्विस का विकल्प\nपरिवारों को टूटने से बचाने के लिए कोर्ट ने 'कम्युनिटी सर्विस' जैसे वैकल्पिक दंड पर विचार करने को कहा है। इससे परिवारों को अलग किए बिना कानून का पालन भी सुनिश्चित किया जा सकेगा। इसके अलावा, कोर्ट ने राज्य सरकार को भी नसीहत दी है कि किशोरों को शिक्षा और वोकेशनल ट्रेनिंग से जोड़कर ही ऐसी स्थितियों को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
