इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सितंबर 2025 के बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि दंगों के दौरान लगाए गए नारे राष्ट्रीय अखंडता के लिए चुनौती हैं और इन्हें धार्मिक नारेबाजी नहीं माना जा सकता।
8 सितंबर 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के संस्थापक मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया है। वे 27 सितंबर 2025 से न्यायिक हिरासत में हैं। यह मामला 26 सितंबर 2025 को बरेली में हुई हिंसक घटनाओं से जुड़ा है।
इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे को स्पष्ट किया। कोर्ट ने पारंपरिक धार्मिक उद्घोषों और प्रदर्शनों के दौरान लगाए गए 'सर तन से जुदा' जैसे नारों के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे नारे भारतीय कानून और देश की संप्रभुता के लिए सीधी चुनौती हैं, न कि व्यक्तिगत धार्मिक आस्था का हिस्सा।
राज्य प्रशासन का आरोप है कि मौलाना तौकीर रजा ही इस भीड़ के 'मास्टरमाइंड' थे, जिसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लागू निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया। अभियोजन पक्ष ने दलील दी कि प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया, जिससे क्षेत्र की कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी।
जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने जोर देकर कहा कि सांप्रदायिक सद्भाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव है। अदालत ने माना कि आरोपी का आचरण और घटना के दौरान दिए गए बयान सार्वजनिक शांति के लिए खतरा पैदा करने वाले थे। न्यायपालिका ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत मिली अभिव्यक्ति की आजादी किसी को भी हिंसा भड़काने या कानून के शासन को चुनौती देने की छूट नहीं देती है।
उत्तर प्रदेश के कानून-व्यवस्था और नियामक परिवेश पर नजर रखने वाले लोगों के लिए यह फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मामला सार्वजनिक रूप से भड़काऊ भाषणों पर न्यायपालिका के सख्त रुख को दर्शाता है।
