सितंबर के महीने में भारतीय प्राइमरी मार्केट में रिकॉर्ड **34** कंपनियों ने अपने IPO पेश किए और **₹39,380 करोड़** जुटाए। हालांकि, रेगुलेटरी डेडलाइन के चलते आई इस तेजी के बीच लिस्टिंग प्रीमियम घटकर अब केवल **5.9%** रह गया है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय है।
सितंबर 2026 में भारतीय शेयर बाजार में एक अभूतपूर्व हलचल देखने को मिली। रेगुलेटरी डेडलाइन के दबाव में कंपनियों की झड़ी लग गई और कुल 34 कंपनियों ने बाजार से ₹39,380 करोड़ की भारी-भरकम राशि जुटाई। यह आंकड़ा इस साल का अब तक का सबसे बड़ा मासिक फंडरेजिंग रिकॉर्ड है।
लिस्टिंग गेन्स का 'गुब्बारा' फूटा
बाजार की चमक के पीछे की सच्चाई थोड़ी अलग है। अगस्त में जहां लिस्टिंग प्रीमियम 24.4% के आसपास था, वहीं सितंबर में यह लुढ़ककर मात्र 5.9% पर आ गया है। निवेशकों की 'क्विक प्रॉफिट' की उम्मीदें अब ठंडी पड़ती दिख रही हैं।
वैल्युएशन और फंड की चिंता
कंपनियों के महंगे वैल्युएशन ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। सितंबर में आए IPO का मीडियन P/E मल्टीपल 42.5 गुना रहा, जो अगस्त के 33.7 गुना से कहीं ज्यादा है। ESDS Software Solution और Hero Motors जैसी कंपनियों में वैल्युएशन 140 गुना से भी ऊपर चला गया है।
इसके अलावा, कुल जुटाए गए फंड का 75% हिस्सा ऑफर फॉर सेल (OFS) के जरिए आया है। इसका सीधा मतलब यह है कि पैसा कंपनी के विकास में लगने के बजाय प्रमोटरों और पुराने निवेशकों की जेब में गया है। SBI Funds Management जैसे हालिया उदाहरण भी इस बात की गवाही देते हैं कि ऊंचे वैल्युएशन पर लिस्ट हुए शेयर अब अपने ऑफर प्राइस से नीचे ट्रेड कर रहे हैं। फिलहाल 200 से ज्यादा कंपनियां कतार में हैं, ऐसे में अब निवेशकों को लिस्टिंग गेन्स के बजाय कंपनी के फंडामेंटल्स पर अधिक ध्यान देना होगा।
