National Stock Exchange (NSE) का बहुप्रतीक्षित IPO 17 सितंबर 2026 को लॉन्च होने जा रहा है। इसका प्राइस बैंड ₹1,700 से ₹1,785 तय किया गया है। जहां निवेशक इसके कैश-इक्विटी मार्केट में एकाधिकार (Monopoly) को लेकर उत्साहित हैं, वहीं डेरिवेटिव्स मार्केट में बढ़ती रेगुलेटरी सख्ती और घटता मार्केट शेयर चिंता का सबब बना हुआ है।
भारी-भरकम इश्यू और वैल्युएशन
इस आईपीओ के जरिए कंपनी ₹21,494 करोड़ से ₹22,569 करोड़ जुटाने की तैयारी में है। अगर फाइनेंशियल्स पर नजर डालें, तो NSE ने FY26 में ₹16,601 करोड़ का रेवेन्यू और ₹10,302 करोड़ का नेट प्रॉफिट दर्ज किया है। हालांकि, यह प्रॉफिट FY25 के मुकाबले 15.47% कम है, लेकिन कंपनी का 66.9% का EBITDA मार्जिन और 33% का रिटर्न ऑन इक्विटी इसे एक मजबूत प्लेयर बनाता है। ऊपरी प्राइस बैंड ₹1,785 पर इसका वैल्युएशन 42.9x है, जो BSE लिमिटेड के 49.3x की तुलना में थोड़ा सस्ता नजर आता है।
डेरिवेटिव्स का रिस्क और रेगुलेटरी दबाव
NSE की कमाई का बड़ा हिस्सा, यानी 60% रेवेन्यू, सिर्फ इक्विटी ऑप्शंस (Derivatives) से आता है। यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। रेगुलेटरी सख्ती के चलते NSE का ऑप्शंस मार्केट शेयर FY24 के 96.86% से गिरकर FY26 में 74.71% पर आ गया है। निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या डेरिवेटिव्स वॉल्यूम में आ रही गिरावट का असर कंपनी के मुनाफे पर और ज्यादा पड़ेगा?
आगे की राह
कंपनी अब अपनी निर्भरता कम करने के लिए NSE Clearing, NSE Indices और एनालिटिक्स बिजनेस पर फोकस कर रही है, जो फिलहाल कुल रेवेन्यू का करीब 12% हिस्सा है। लॉन्ग टर्म निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी होगा कि क्या NSE आने वाले समय में अपने नॉन-ट्रांजैक्शन बिजनेस को तेजी से बढ़ा पाती है या नहीं।
