National Stock Exchange (NSE) के IPO में निवेशकों की जबरदस्त दिलचस्पी दिख रही है। दूसरे दिन की समाप्ति तक यह इश्यू **46%** सब्सक्राइब हो चुका है, जहां निवेशक कंपनी की बाजार में मजबूत पकड़ और रेगुलेटरी चुनौतियों के बीच तालमेल बैठा रहे हैं।
डेरिवेटिव्स मार्केट में बादशाहत
NSE के वैल्यूएशन के पीछे सबसे बड़ी वजह भारत के डेरिवेटिव्स मार्केट में इसका एकाधिकार (monopoly) है। कंपनी की कमाई का एक बड़ा हिस्सा फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडिंग से मिलने वाले ट्रांजैक्शन चार्जेस से आता है। यही हाई-वॉल्यूम कारोबार कंपनी को एक स्टेबल इनकम का जरिया देता है, जो निवेशकों को अपनी ओर खींच रहा है।
BSE से तुलना और चुनौतियां
निवेशक अक्सर NSE की तुलना BSE से करते हैं। हालांकि BSE एशिया का सबसे पुराना एक्सचेंज है, लेकिन वॉल्यूम और लिक्विडिटी के मामले में NSE फिलहाल मीलों आगे है। वहीं, निवेशकों को इसके पुराने रेगुलेटरी इतिहास को भी नहीं भूलना चाहिए। 'को-लोकेशन' केस (co-location case) में SEBI की जांच और उन पर लगे आरोपों का साया पहले रहा है। हालांकि, मैनेजमेंट में बड़े बदलाव और टेक्नोलॉजी में अपग्रेड के बाद अब एक्सचेंज पर रेगुलेटर्स की पैनी नजर रहती है।
आगे की राह
IPO से मिलने वाले फंड का इस्तेमाल कंपनी अपने डिजिटल फुटप्रिंट को बढ़ाने, क्लियरिंग और सेटलमेंट सर्विसेज को बेहतर बनाने और टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में करेगी। अब निवेशकों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या आखिरी दिनों में इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स की तरफ से वैसी ही भारी मांग देखने को मिलती है या नहीं।
