National Stock Exchange (NSE) जल्द ही **₹22,561 करोड़** का IPO लाने की तैयारी में है। हालांकि, मौजूदा बाजार BSE की लिस्टिंग के समय से काफी अलग और परिपक्व (mature) हो चुका है, जिस पर निवेशकों को गौर करना चाहिए।
भारत के सबसे बड़े एक्सचेंज, National Stock Exchange (NSE) के ₹22,561 करोड़ के IPO ने बाजार में हलचल बढ़ा दी है। निवेशक स्वाभाविक रूप से इसकी तुलना 2017 में लिस्ट हुए BSE से कर रहे हैं, लेकिन हकीकत में दोनों का परिदृश्य अलग है।
BSE का 'स्केर्सिटी प्रीमियम'
जब BSE लिस्ट हुआ था, तब वह भारत के इक्विटी मार्केट की ग्रोथ का अकेला विकल्प था। इस 'स्केर्सिटी प्रीमियम' और उस समय कम रिटेल भागीदारी के चलते, BSE ने 8 साल में 50.3% का शानदार CAGR दिया है। उस समय बाजार के डिजिटलीकरण की शुरुआत हो रही थी, जिससे ग्रोथ की अपार संभावनाएं थीं।
बाजार की बदली तस्वीर
आज NSE एक ऐसे बाजार में कदम रख रहा है जहां रिटेल निवेशकों की संख्या FY20 के 3.1 करोड़ से बढ़कर 13.5 करोड़ पहुंच चुकी है। इसका मतलब है कि वह शुरुआती तेजी वाला दौर, जहां यूजर बेस तेजी से बढ़ता था, पहले ही मार्केट में प्राइस-इन हो चुका है।
रेगुलेटरी दबाव और बदलता माहौल
BSE की लिस्टिंग के बाद से SEBI ने मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर संस्थानों पर निगरानी काफी कड़ी कर दी है। चाहे वह ट्रेडिंग सिस्टम हो, रिस्क मैनेजमेंट हो या क्लियरिंग हाउस के नियम—अब एक्सचेंज एक बहुत ही नियंत्रित मार्जिन वाले वातावरण में काम करते हैं।
ग्लोबल और घरेलू तुलना
दुनियाभर के प्रमुख एक्सचेंज जैसे Intercontinental Exchange और Japan Exchange Group का ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि एक्सचेंज शेयरों की ग्रोथ हमेशा सीधी रेखा में नहीं होती। वहीं, भारत में MCX ने 37% का CAGR दर्ज किया है, लेकिन उसका बिजनेस कमोडिटी-केंद्रित है, जो NSE के ब्रॉड इक्विटी बिजनेस से अलग है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों को केवल BSE के पुराने रिटर्न को देखकर फैसला नहीं लेना चाहिए। अब फोकस इस पर होना चाहिए कि कंपनी का वैल्यूएशन क्या रहता है, ट्रेडिंग वॉल्यूम के ट्रेंड कैसे हैं और भविष्य की प्रॉफिटेबिलिटी पर रेगुलेटरी नियमों का क्या असर पड़ेगा। आने वाले समय में NSE की सफलता उसके द्वारा इस मैच्योर और कॉम्पिटिटिव मार्केट को मैनेज करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
