साल 2026 में प्राइमरी मार्केट का ट्रेंड बदल गया है। आंकड़े बताते हैं कि **20x** से कम की अर्निंग्स वाले IPO ने निवेशकों को **45.4%** का शानदार मीडियन रिटर्न दिया है, जबकि महंगे IPOs लंबी अवधि में पिछड़ गए हैं।
साल 2026 के प्राइमरी मार्केट में एक बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। जिन कंपनियों ने वाजिब वैल्यूएशन पर IPO पेश किए, उन्होंने निवेशकों को मालामाल कर दिया है। जहाँ 20 गुना (20x) से कम अर्निंग्स पर आने वाले IPO ने 45.4% का रिटर्न दिया है, वहीं 30 से 50 गुना की महंगी अर्निंग्स पर लिस्ट होने वाली कंपनियां केवल लिस्टिंग डे पर ही उछाल दिखा पा रही हैं।
वैल्यूएशन का गणित
ज्यादा वैल्यूएशन वाले IPO अक्सर लिस्टिंग के दिन 23.2% तक का तगड़ा प्रीमियम देते हैं, लेकिन इसके बाद उनमें सुस्ती छा जाती है। डेटा के मुताबिक, ऐसे शेयरों में लिस्टिंग के बाद केवल 10.5% की ही बढ़त देखी गई। हकीकत यह है कि जब कंपनी बहुत महंगे भाव पर लिस्ट होती है, तो उसके पास भविष्य में बढ़ने की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।
फ्रेश कैपिटल वर्सेस OFS
IPO की बनावट भी रिटर्न तय करती है। जिन कंपनियों ने बिजनेस विस्तार के लिए 'फ्रेश कैपिटल' (Fresh Capital) जुटाया, उनका प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा और उन्होंने 51.3% का मीडियन रिटर्न दिया। इसके विपरीत, 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) वाले IPO में प्रमोटर्स और प्राइवेट इक्विटी निवेशक अपना हिस्सा बेचकर निकलते हैं, जिससे रिटेल निवेशकों के लिए बहुत कम upside बचता है।
बाजार का कड़वा सच
दिग्गज कंपनियां भी वैल्यूएशन के दबाव से नहीं बच पाई हैं। उदाहरण के तौर पर, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का शेयर गिरकर ₹1,761 पर आ गया है, जो उसके इश्यू प्राइस ₹1,785 से नीचे है। कच्चे तेल की कीमतें, बॉन्ड यील्ड और मार्केट करेक्शन के दौर में महंगे शेयरों में गिरावट सबसे तेज होती है। निवेशकों के लिए सबक यही है कि IPO के जोश में आने के बजाय कंपनी के लॉन्ग-टर्म अर्निंग्स ट्रेजेक्टरी को परखना ज्यादा जरूरी है।
