रिकॉर्ड फंड रेज़िंग, पर निवेशकों को घाटा
भारतीय शेयर बाज़ार में इस बार रिकॉर्ड तोड़ फंड जुटाया गया है। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) के बेहतर रेगुलेटरी माहौल और अधिक विकसित IPO मार्केट के चलते प्राइमरी मार्केट में बंपर तेजी देखी गई। फाइनेंशियल ईयर 2026 (FY26) में कंपनियों ने ₹1.8 ट्रिलियन का रिकॉर्ड फंड जुटाया, जो FY25 के ₹1.62 ट्रिलियन से कहीं ज़्यादा है। इस रिकॉर्ड फंड रेज़िंग ने भारत को 2025 में डील की संख्या के हिसाब से दुनिया का सबसे बिज़ी लिस्टिंग डेस्टिनेशन बना दिया।
SEBI के सितंबर 2025 के पॉलिसी बदलावों, जैसे मिनिमम पब्लिक ऑफर और मिनिमम पब्लिक शेयरहोल्डिंग के लिए समय-सीमा बढ़ाने, ने इस तेजी को और बल दिया। अप्रैल 13, 2026 तक, निफ्टी SENSEX का प्राइस-टू-अर्निंग (P/E) रेश्यो लगभग 21.310 था, जो बाज़ार की वैल्यूएशन का एक सामान्य संकेत देता है।
निवेशक रिटर्न: हकीकत कुछ और
लेकिन यह फंड रेज़िंग का बूम निवेशकों के लिए एक अलग कहानी बयां करता है। लिस्टिंग के बाद के प्रदर्शन (post-listing performance) से बाज़ार का उत्साह बिल्कुल अलग नज़र आया। FY26 में मेनबोर्ड IPOs के ज़रिए जुटाए गए ₹1.8 ट्रिलियन में से, लिस्टिंग के बाद केवल लगभग एक-तिहाई IPOs ही निवेशकों को पॉजिटिव रिटर्न देने में कामयाब रहे।
आंकड़े बताते हैं कि FY26 में लॉन्च हुए 109 मेनबोर्ड IPOs में से 71 (लगभग 108 का विश्लेषण किया गया) मार्च 2026 तक अपने इश्यू प्राइस से नीचे ट्रेड कर रहे थे। FY26 में औसत लिस्टिंग गेन (average listing gain) घटकर सिर्फ 8% रह गया, जो पिछले साल के 30% के मुकाबले एक बड़ी गिरावट है। मार्च 2026 के आखिर तक, लिस्ट हुए IPOs का औसत रिटर्न -7% तक गिर गया था, और 2026 की शुरुआत में यह -1.9% था। इससे साफ है कि निवेशक अब ज़्यादा सेलेक्टिव हो रहे हैं और केवल उन कंपनियों में पैसा लगा रहे हैं जिनके पास मजबूत फंडामेंटल (strong fundamentals) और कैपिटल का इस्तेमाल करने के स्पष्ट प्लान हैं।
कॉन्फिडेंशियल फाइलिंग का बढ़ता चलन
IPO प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला एक बड़ा ट्रेंड कॉन्फिडेंशियल फाइलिंग (Confidential Filings) का बढ़ता इस्तेमाल है। SEBI ने नवंबर 2022 में इस सुविधा की शुरुआत की थी, जिससे कंपनियां रेगुलेटरी फीडबैक लेने और बाज़ार की कंडीशन का अंदाज़ा लगाने के लिए ड्राफ्ट ऑफर डॉक्यूमेंट्स को प्राइवेटली सबमिट कर सकती हैं, इससे पहले कि वे पब्लिक हों।
यह तरीका कंपनियों को अपने बिज़नेस की संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा करने और मार्केट में डेब्यू करने के समय में फ्लेक्सिबिलिटी देता है। मार्च 2025 से अब तक लगभग 20 फर्मों ने इस कॉन्फिडेंशियल रास्ते का इस्तेमाल किया है। हालांकि, यह कंपनियों को बेहतर तैयारी का मौका देता है, लेकिन इससे शुरुआती पब्लिक जांच-परख (scrutiny) कम हो जाती है, जिससे निवेशक फीडबैक सीमित हो सकता है और प्राइसिंग या स्ट्रैटेजी में गलतियां होने की आशंका बढ़ जाती है।
IPO क्वालिटी पर सवाल और रिटेल निवेशकों की थकान
मौजूदा बाज़ार की स्थितियां उन कंपनियों के बीच एक बड़ा गैप दिखा रही हैं जो पब्लिक हो रही हैं और निवेशकों के नतीजों के बीच। SEBI का फोकस तेज़ी से क्लीयरेंस देने के बजाय एफिशिएंट रिव्यू पर है, ताकि एक मैच्योर IPO मार्केट बन सके। लेकिन घटते लिस्टिंग गेन और अंडरपरफॉर्म करने वाले IPOs की बढ़ती संख्या, पेश किए जा रहे IPOs की क्वालिटी पर सवाल खड़े करती है।
इसके अलावा, कई IPOs में ऑफर फॉर सेल (Offer for Sale - OFS) का बड़ा हिस्सा होता है, जिसमें पैसा कंपनी की ग्रोथ के बजाय मौजूदा शेयरधारकों को जाता है। इससे कंपनी के विस्तार के लिए अपेक्षित पूंजी प्रवाह (capital infusion) कम हो जाता है। इस ट्रेंड के साथ-साथ रिटेल निवेशक की भागीदारी में भी खासी गिरावट आई है - FY26 में प्रति IPO औसत एप्लीकेशन 12.87 लाख रही, जबकि FY25 में यह 21.31 लाख थी। यह निराशाजनक रिटर्न के कारण रिटेल निवेशकों की बढ़ती थकान को दर्शाता है।
बाज़ार की कंपनियों के स्पष्ट मुनाफे (clear earnings) और मजबूत बैलेंस शीट को प्राथमिकता देने की वजह से, अधिक सट्टा (speculative) या आक्रामक तरीके से प्राइस किए गए IPOs के अंडरपरफॉर्म करने का खतरा बढ़ जाता है, जो 2026 की शुरुआत में देखे गए नेगेटिव औसत रिटर्न में योगदान देता है। कॉन्फिडेंशियल फाइलिंग से बढ़ी जटिलता लंबी अवधि की ट्रांसपेरेंसी और निवेशक सुरक्षा पर भी सवाल उठाती है।
आगे की राह
लिस्टिंग के बाद के प्रदर्शन की चुनौतियों के बावजूद, IPOs का पाइपलाइन (pipeline) मजबूत बना हुआ है। लगभग 64 कंपनियां SEBI क्लीयरेंस का इंतज़ार कर रही हैं, और 124 को अप्रूवल मिल चुका है पर अभी लॉन्च नहीं किया है।
घरेलू लिक्विडिटी (domestic liquidity) और बाज़ार की गहराई व निवेशक भागीदारी को बढ़ाने के SEBI के लगातार सुधारों के समर्थन से, ओवरऑल बाज़ार का सेंटिमेंट (sentiment) जारी गतिविधि का संकेत देता है। हालांकि, अब फोकस निवेशक चयनात्मकता (investor selectivity) पर बढ़ने की उम्मीद है। वे कंपनियां जो मजबूत बिज़नेस फंडामेंटल, जिम्मेदार कैपिटल उपयोग और यथार्थवादी वैल्यूएशन (realistic valuations) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत कर सकती हैं, उनके अधिक इंटरेस्ट आकर्षित करने की उम्मीद है। इसके विपरीत, जो कंपनियां केवल प्रचार (hype) या आक्रामक प्राइसिंग पर निर्भर करती हैं, उन्हें एक ऐसे प्राइमरी मार्केट में सार्थक रिटर्न देने में मुश्किल हो सकती है जो ज़्यादा सतर्क और चुनिंदा होता जा रहा है।