आंकड़े बताते हैं कि हालिया भारतीय IPO में जुटाई गई **50% से 70%** राशि 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) के जरिए पुराने निवेशकों की जेब में जा रही है। इसका मतलब है कि पैसा कंपनी के विस्तार के बजाय प्रमोटरों और शुरुआती निवेशकों के एग्जिट के काम आ रहा है।
भारतीय प्राइमरी मार्केट का चेहरा बदल रहा है। पिछले 3 साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो मुख्य बोर्ड के IPO में जुटाई गई कुल राशि का 50% से 70% हिस्सा 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) से आ रहा है। सरल शब्दों में कहें तो, आप जो पैसा निवेश कर रहे हैं, वह कंपनी की ग्रोथ में लगने के बजाय प्रमोटरों, प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल फर्मों को बाहर निकलने का रास्ता (एग्जिट रूट) दे रहा है।
Fresh Issue vs OFS: क्या है फर्क?
IPO में दो मुख्य हिस्से होते हैं: 'फ्रेश इश्यू' (Fresh Issue) और 'ऑफर फॉर सेल' (OFS)। फ्रेश इश्यू का पैसा कंपनी के कर्ज चुकाने, नई फैक्ट्री लगाने या वर्किंग कैपिटल के रूप में बिजनेस में जाता है। वहीं, OFS में कंपनी को एक रुपया नहीं मिलता; इसमें मौजूदा शेयरधारक अपने शेयर जनता को बेचकर मुनाफा वसूलते हैं।
वैल्यूएशन का गणित और जोखिम
आजकल के IPO में वैल्युएशन मल्टीपल्स 21.6x EV/EBITDA के स्तर तक देखे जा रहे हैं। हाई वैल्युएशन और बड़े OFS का कॉम्बिनेशन निवेशकों के लिए चेतावनी की घंटी हो सकता है। जब शुरुआती बैकर्स बड़ी हिस्सेदारी बेच रहे होते हैं, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या वैल्युएशन कंपनी के प्रदर्शन के दम पर है या केवल बाजार के उत्साह के कारण।
'Skin in the Game' क्यों जरूरी है?
लंबे समय के निवेशकों के लिए 'स्किन इन द गेम' यानी प्रमोटर की कंपनी में हिस्सेदारी बहुत मायने रखती है। अगर प्रमोटर अपना बड़ा हिस्सा IPO में बेच रहे हैं, तो यह संकेत हो सकता है कि उन्होंने अपना रिटर्न लक्ष्य हासिल कर लिया है।
निवेशकों को क्या करना चाहिए?
निवेश करने से पहले हमेशा रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) के 'Objects of the Offer' सेक्शन को पढ़ें। वहां साफ लिखा होता है कि पैसा फ्रेश इश्यू में जा रहा है या OFS में। अगर OFS का हिस्सा ज्यादा है, तो समझें कि कंपनी के पास मौजूदा रिसोर्सेज कितने हैं और वे आगे की ग्रोथ कैसे प्लान कर रहे हैं।
