लिस्टिंग पर उछाल, पर लंबी अवधि में नुकसान?
हाल के आंकड़ों के मुताबिक, 30 अप्रैल 2026 तक, जनवरी 2025 से मार्च 2026 के बीच लॉन्च हुए 115 IPOs में से लगभग 58.2% अपने ऑफर प्राइस से नीचे ट्रेड कर रहे हैं। यह स्थिति उस दौर के ठीक विपरीत है जब 61.7% IPOs ने लिस्टिंग-डे पर अपने इश्यू प्राइस से ऊपर बंद होकर शानदार शुरुआत की थी।
जो निवेशक लिस्टिंग के बाद भी इन स्टॉक्स को होल्ड करते हैं, उन्हें औसतन -14% का निगेटिव रिटर्न मिला है, जबकि औसत रिटर्न -6.85% रहा है। यह अंडरपरफॉर्मेंस काफी व्यापक है, और 2025 के लगभग 55% स्टार्टअप IPOs भी मार्च 2026 तक अपने इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रहे थे।
एक्सपर्ट्स की राय और वजहें
प्राइम डेटाबेस ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर, प्रणव हल्दिया का कहना है कि लगातार उम्मीद करना कि IPOs इश्यू प्राइस से ऊपर ट्रेड करेंगे, यह अवास्तविक है। उन्होंने बताया कि लिस्टिंग के बाद का प्रदर्शन किसी भी स्थापित कंपनी की तरह कंपनी के फंडामेंटल, सेक्टर के ट्रेंड और समग्र आर्थिक स्थितियों पर निर्भर करता है।
इस बड़ी खाई की कई वजहें हैं:
- हाई वैल्यूएशन (High Valuations): कई IPOs को बहुत ऊंचे वैल्यूएशन पर लिस्ट किया जाता है, जिससे उनके लिए लिस्टिंग के बाद और ऊपर जाने की गुंजाइश कम रह जाती है।
- स्पेक्युलेटिव ट्रेडिंग (Speculative Trading): शुरुआती उत्साह अक्सर अल्पकालिक साबित होता है। मार्केट अब 'प्रॉफिटेबिलिटी प्रीमियम' की मांग कर रहा है, और उन IPOs को दंडित कर रहा है जिनमें स्पष्ट कमाई की उम्मीद या मजबूत बिज़नेस मॉडल नहीं हैं।
- एफआईआई (FII) का पैसा निकालना: 2025 और 2026 की शुरुआत में, फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) ने करेंसी की समस्याएं, ऊंचे वैल्यूएशन और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण अरबों डॉलर निकाले। इससे लिक्विडिटी (liquidity) कम हुई और नए लिस्टिंग के प्रति आकर्षण घटा।
- आर्थिक दबाव: जियोपॉलिटिकल टेंशन के कारण ऑयल की बढ़ती कीमतें और संभावित महंगाई जैसी आर्थिक चुनौतियाँ कॉर्पोरेट मुनाफे को प्रभावित कर रही हैं और इन्वेस्टर कॉन्फिडेंस को कम कर रही हैं।
- कमजोर रुपया: मई 2026 की शुरुआत में भारतीय रुपया US डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया, जिससे इम्पोर्ट कॉस्ट्स बढ़ीं और इन्वेस्टर सेंटीमेंट पर नकारात्मक असर पड़ा।
आगे क्या?
FY26 कैपिटल रेजिंग के लिए एक महत्वपूर्ण साल रहने की उम्मीद है, लेकिन लिस्टिंग-डे पर मिलने वाले लाभ FY24 और FY25 की तुलना में नरम पड़े हैं। सेंसेक्स और निफ्टी ने 2025 में रुपये के टर्म्स में अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन करेंसी डेप्रिसिएशन और एफआईआई के बड़े पैमाने पर आउटफ्लो के कारण डॉलर के टर्म्स में वे वैश्विक स्तर पर कमजोर रहे।
कुल मिलाकर, IPOs में लिस्टिंग-डे पर मिलने वाली तेजी के बाद गिरावट का पैटर्न यह दर्शाता है कि मार्केट अब सिर्फ शुरुआती उत्साह पर नहीं, बल्कि कंपनी की वास्तविक वित्तीय सेहत और ग्रोथ स्ट्रेटेजी पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। यह IPO मार्केट के परिपक्व होने का संकेत है, जहां निवेशकों को अब अधिक सावधानी बरतनी होगी।
