भारतीय शेयर बाजार में FY27 की पहली छमाही में IPOs के जरिए रिकॉर्ड **₹94,205 करोड़** जुटाए गए हैं। हालांकि, इनमें से **60%** पैसा कंपनी के विकास के बजाय पुराने निवेशकों की जेब में गया है।
भारतीय प्राइमरी मार्केट के लिए फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली छमाही ऐतिहासिक रही है। इस दौरान 78 कंपनियों ने कुल ₹94,205 करोड़ जुटाए हैं। लेकिन आंकड़ों की गहराई में जाने पर एक बड़ा बदलाव साफ दिखता है। यह उछाल किसी बिजनेस विस्तार के कारण नहीं, बल्कि 'ऑफर्स फॉर सेल' (OFS) की बदौलत आया है।
OFS का दबदबा
कुल जुटाई गई रकम का लगभग 59% यानी ₹55,695 करोड़ हिस्सा सिर्फ OFS के जरिए आया है, जहां प्रमोटर्स और शुरुआती निवेशकों ने अपने शेयर बेचे हैं। इसमें National Stock Exchange (NSE) का आईपीओ सबसे बड़ा था, जिसने अकेले ₹22,563 करोड़ का सेकेंडरी स्टेक सेल किया था। जब कोई इतना बड़ा आईपीओ सिर्फ शेयर बेचने के लिए आता है, तो कुल फंडरेजिंग के आंकड़े बढ़ जाते हैं, लेकिन कंपनी के बिजनेस में नया पैसा नहीं पहुंचता।
क्यों आई सितंबर में बाढ़?
बाजार में यह हलचल अचानक नहीं बढ़ी। SEBI ने उन कंपनियों को राहत दी थी जिनके आईपीओ अप्रूवल लेटर अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच एक्सपायर होने वाले थे। यह छूट 30 सितंबर, 2026 को खत्म हो गई, जिसके कारण कंपनियों को रि-फाइलिंग के झंझट से बचने के लिए उसी विंडो में आईपीओ लाने की जल्दी थी।
निवेशकों के लिए सबक
रिटेल निवेशकों को 'फ्रेश इश्यू' और 'OFS' के बीच का फर्क समझना बहुत जरूरी है। फ्रेश इश्यू का पैसा कंपनी के विस्तार में लगता है, जबकि OFS से पैसा सीधे बेचने वाले शेयरहोल्डर को मिलता है। यही नहीं, आजकल जो कंपनियां फ्रेश कैपिटल जुटा भी रही हैं, उनमें से ज्यादातर उसे नए प्रोजेक्ट्स के बजाय कर्ज चुकाने (Debt Retirement) में लगा रही हैं। अगर आप भविष्य में किसी आईपीओ में पैसा लगाने की सोच रहे हैं, तो फंड के इस्तेमाल (End-use of funds) को जरूर बारीकी से देखें।
