भारतीय आईपीओ मार्केट ने फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली छमाही में इतिहास रच दिया है। मार्केट ने कुल **₹94,205 करोड़** जुटाए हैं, जो पिछले साल के मुकाबले **35%** ज्यादा है। सुस्त सेकेंडरी मार्केट के बीच नई कंपनियों की बहार है, लेकिन आने वाले समय में **₹2.78 लाख करोड़** की भारी पाइपलाइन लिक्विडिटी के लिए चुनौती बन सकती है।
भारतीय प्राइमरी मार्केट ने फाइनेंशियल ईयर 2027 के पहले 6 महीनों में जबरदस्त ताकत दिखाई है। इस दौरान कुल 78 मेनबोर्ड आईपीओ के जरिए रिकॉर्ड ₹94,205 करोड़ जुटाए गए। गौर करने वाली बात यह है कि जहां निफ्टी 50 और सेंसेक्स जैसे बेंचमार्क इंडेक्स सिर्फ 1.3% और 0.7% की मामूली बढ़त पर सिमटे रहे, वहीं आईपीओ मार्केट ने निवेशकों को औसतन 19% का लिस्टिंग गेन दिया है।
नई बनाम पुरानी कंपनियों में अंतर
फिलहाल मार्केट में एक बड़ा विरोधाभास दिख रहा है। विदेशी निवेशक जहां पुरानी कंपनियों के शेयरों में बिकवाली कर रहे हैं, वहीं घरेलू निवेशक नए आईपीओ पर दांव लगाने के लिए बेताब हैं। यह साफ दिखाता है कि निवेशकों की प्राथमिकता अब पुरानी सुस्त कंपनियों के बजाय ग्रोथ वाली नई कंपनियां बन गई हैं।
बड़े आईपीओ का असर
इस रिकॉर्ड फंड जुटाने में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के ₹22,563 करोड़ के आईपीओ ने मुख्य भूमिका निभाई। इसके अलावा SBI फंड्स मैनेजमेंट और मणिपाल हेल्थ एंटरप्राइजेज जैसे बड़े नामों ने भी इसमें बड़ा योगदान दिया। अगर हम क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट (QIP) और सरकार द्वारा जारी ऑफर फॉर सेल (OFS) को भी जोड़ दें, तो कुल इक्विटी मोबिलाइजेशन ₹2.43 लाख करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है।
आगे की चुनौतियां और रिस्क
भविष्य में बाजार के सामने 145 नई कंपनियों का एक बड़ा पहाड़ खड़ा है, जिन्हें SEBI से मंजूरी मिल चुकी है। इनकी कुल वैल्यू ₹2.78 लाख करोड़ आंकी गई है। हालांकि यह ग्रोथ का संकेत है, लेकिन बाजार की लिक्विडिटी पर इसका भारी दबाव पड़ सकता है। अगर मार्केट में नई कंपनियों की बाढ़ इसी रफ्तार से जारी रही, तो 'वैल्यूएशन फटीग' (Valuation Fatigue) का खतरा बढ़ सकता है और लिस्टिंग गेन में कमी आ सकती है।
