पिछले 18 महीनों में भारत के मेनबोर्ड IPOs से जहां ₹2.3 लाख करोड़ जुटाए गए, वहीं इसका 60% से ज़्यादा हिस्सा यानी **₹1.45 लाख करोड़** कंपनियों के विकास के बजाय पुराने शेयरधारकों (प्रमोटरों) को ऑफर-फॉर-सेल (OFS) के ज़रिए मिला है। अब निवेशक लिस्टिंग पर कम कमाई और लिस्टिंग के बाद नेगेटिव रिटर्न देख रहे हैं, जिससे यह समझना ज़रूरी हो गया है कि कंपनियों के विस्तार के लिए नई पूंजी आ रही है या शुरुआती निवेशकों का कैश एग्जिट हो रहा है।
IPO से पैसा कंपनियों को नहीं, निवेशकों को?
जनवरी 2025 से अगस्त 2026 के बीच भारतीय प्राइमरी मार्केट में आईपीओ (IPO) की धूम रही, जिसमें मेनबोर्ड इश्यूज़ से करीब ₹2.3 लाख करोड़ जुटाए गए। पब्लिक से अच्छी खासी दिलचस्पी तो दिखी, लेकिन आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि इस रकम का बड़ा हिस्सा नई फैक्ट्रियां लगाने, नए लोगों को नौकरी देने या इनोवेशन में खर्च होने के बजाय सीधे शुरुआती निवेशकों और प्रमोटरों की जेब में चला गया। ऑफर-फॉर-सेल (OFS) के तहत ₹1.45 लाख करोड़, यानी कुल राशि का 61.2%, इन्हीं शुरुआती निवेशकों को मिला।
ऑफर-फॉर-सेल (OFS) का मतलब
ऑफर-फॉर-सेल (OFS) में कंपनी को पब्लिक इश्यू से कोई पैसा नहीं मिलता। यह रकम सीधे मौजूदा शेयरधारकों, जैसे प्राइवेट इक्विटी फर्म या प्रमोटरों को मिलती है, जो IPO का इस्तेमाल अपनी हिस्सेदारी बेचकर बाहर निकलने के लिए कर रहे होते हैं। इसकी तुलना में, केवल ₹92,175 करोड़, यानी कुल जुटाई गई रकम का 38.8%, ही कंपनी के लिए फ्रेश कैपिटल के तौर पर आया, जिसका इस्तेमाल कर्ज चुकाने या बिजनेस बढ़ाने जैसे कामों में होना था।
मार्केट पर क्या असर?
OFS-हैवी IPOs का यह ट्रेंड मार्केट जानकारों के लिए चिंता का विषय बन गया है। जब IPO का बड़ा हिस्सा पुराने निवेशकों के एग्जिट के लिए होता है, तो कंपनी को बढ़ने के लिए ज़रूरी संसाधन नहीं मिल पाते, भले ही पब्लिक ने भविष्य की उम्मीदों के साथ शेयर खरीदे हों। एनालिस्ट्स का कहना है कि हिस्सेदारी बेचना प्राइवेट इक्विटी निवेशकों के लिए स्वाभाविक है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में महंगे वैल्यूएशन पर एग्जिट दिखाता है कि प्राइमरी मार्केट का मकसद बदल रहा है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
रिटेल निवेशकों को यह जानना ज़रूरी है कि मार्केट का माहौल बदल गया है। IPOs का क्रेज कम हुआ है, फाइनेंशियल ईयर 2026 में लिस्टिंग-डे पर औसत कमाई घटकर सिर्फ 7% रह गई है, जो फाइनेंशियल ईयर 2025 के 29% से काफी कम है। इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि फाइनेंशियल ईयर 2026 में लिस्ट हुए IPOs का औसत सालाना रिटर्न -17% रहा। यह डेटा बताता है कि ज़्यादा सब्सक्रिप्शन और हाइप का मतलब यह नहीं कि शेयर खरीदने वालों को फायदा ही होगा।
कुछ बड़े OFS IPOs
अप्रैल 2025 से जुलाई 2026 के बीच सात बड़े IPOs पूरी तरह OFS थे, यानी 100% पैसा निकलने वाले निवेशकों को मिला, कंपनी को नहीं। इनमें LG इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया, SBI फंड्स मैनेजमेंट और भारत कुकिंग कोल जैसे बड़े नाम शामिल थे। हालांकि कुछ कंपनियां अभी भी फ्रेश कैपिटल पर ध्यान दे रही हैं, लेकिन निवेशकों को अब सिर्फ ब्रांड नाम और हाइप से आगे देखना होगा।
आगे क्या देखें?
किसी भी आने वाले IPO के लिए सबसे ज़रूरी है कि फ्रेश कैपिटल और OFS के बीच का अनुपात, जुटाई गई रकम का असली इस्तेमाल और ग्रोथ की उम्मीदों के मुकाबले वैल्यूएशन कैसा है। निवेशकों को कंपनी के प्रॉस्पेक्टस को ध्यान से देखना चाहिए कि फ्रेश फंड का इस्तेमाल प्रोडक्टिव कैपिटल खर्च के लिए हो रहा है या सिर्फ पुराने कर्ज चुकाने के लिए। जैसे-जैसे लिस्टिंग पर कमाई कम हो रही है और लिस्टिंग के बाद का प्रदर्शन दबाव में है, प्रमोटरों के इरादे और बिजनेस की क्वालिटी पहले से कहीं ज़्यादा अहम हो गई है।
