साल **2026** के शुरुआती नौ महीनों में भारतीय कंपनियों ने IPO के जरिए रिकॉर्ड **$12.5 बिलियन** जुटाए हैं, जबकि इस दौरान Nifty 50 में **14%** की गिरावट आई है। विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड निकासी के बीच अब लिस्टिंग प्रीमियम में आती कमी निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन रही है।
बड़े ऑफर्स पर निवेशकों का दांव
हालांकि कुल फंड जुटाने का आंकड़ा ऐतिहासिक है, लेकिन लिस्ट होने वाली कंपनियों की संख्या में कमी आई है। इस साल अब तक लगभग 220 डील्स हुई हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 18% कम हैं। इससे साफ है कि निवेशक अब छोटे स्टार्टअप्स के बजाय बड़ी और स्थापित कंपनियों पर भरोसा जता रहे हैं। प्रति डील औसत साइज बढ़कर $57 मिलियन हो गया है, जिसमें National Stock Exchange, SBI Funds Management और Manipal Health जैसी दिग्गज कंपनियों का दबदबा रहा। हालांकि, एक बड़ा हिस्सा 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) के जरिए आया है, जिसका मतलब है कि पैसा कंपनी के विस्तार के बजाय पुराने निवेशकों की जेब में गया है।
घरेलू लिक्विडिटी की परीक्षा
इस समय IPO मार्केट सिर्फ घरेलू निवेशकों के दम पर चल रहा है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने 2026 में अब तक भारतीय बाजार से ₹2.7 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ के बीच रकम बाहर निकाली है। इसकी बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और कमजोर रुपया रहा है। ऐसे में पूरा दारोमदार भारतीय रिटेल और इंस्टीट्यूशनल निवेशकों की खरीदारी पर टिका है।
लिस्टिंग प्रीमियम में आई सुस्ती
निवेशकों के लिए खतरे की घंटी लिस्टिंग प्रीमियम में दिख रही है। अगस्त में जहां औसत लिस्टिंग प्रीमियम 24.4% था, वहीं सितंबर तक यह गिरकर 15.1% पर आ गया। यह बताता है कि नए शेयरों को लेकर मार्केट का उत्साह अब ठंडा पड़ रहा है और निवेशक अधिक सतर्क हो गए हैं।
अभी भी 130 से ज्यादा कंपनियां SEBI की मंजूरी का इंतजार कर रही हैं। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या घरेलू मार्केट इस नई सप्लाई को झेल पाएगा या मार्केट की मौजूदा उठापटक के कारण प्रीमियम और भी घटेंगे।
