Indian IPOs: निवेशकों का बदला मिजाज! लगभग आधे IPO इश्यू प्राइस से नीचे, अब 'प्रॉफिट' पर फोकस

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AuthorAditya Rao|Published at:
Indian IPOs: निवेशकों का बदला मिजाज! लगभग आधे IPO इश्यू प्राइस से नीचे, अब 'प्रॉफिट' पर फोकस
Overview

India के IPO मार्केट में **FY26** के दौरान एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। अब तक इस फाइनेंशियल ईयर में लिस्ट हुए लगभग **46%** मेनबोर्ड IPOs अपने इश्यू प्राइस (Issue Price) से नीचे ट्रेड कर रहे हैं। यह दिखाता है कि निवेशक अब सिर्फ ग्रोथ की बातों के बजाय दमदार मुनाफा (Profit) और मजबूत बैलेंस शीट वाली कंपनियों पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं।

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वैल्यूएशन पर बड़ा सवाल

फाइनेंशियल ईयर 2026 में भारतीय IPO मार्केट ने पिछले सालों के मुकाबले बिल्कुल उलट तस्वीर दिखाई है। अप्रैल तक के आंकड़ों के अनुसार, इस फाइनेंशियल ईयर में लिस्ट हुए 112 मेनबोर्ड IPOs में से 52 इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रहे हैं। इसका मतलब है कि करीब 46% नए लिस्ट हुए शेयरों की वैल्यू गिरी है। यह पिछले सालों से बिलकुल अलग है, जब लिस्टिंग पर अच्छे मुनाफे की गारंटी मानी जाती थी। FY25 में तो औसत लिस्टिंग गेन 30% से घटकर सिर्फ 8% रह गया था, और बाजार में गिरावट के दौरान यह -7% तक भी चला गया था। Pine Labs, HDB Financial Services, Physicswallah और JSW Cement जैसी जानी-मानी कंपनियां भी लिस्टिंग के बाद मिले फायदे को गंवा चुकी हैं और अपने IPO प्राइस से काफी नीचे चल रही हैं। यह व्यापक अंडरपरफॉर्मेंस बताता है कि मार्केट अब बहुत चुनिंदा हो गया है और जो IPOs महंगे थे, उन्हें सीधे तौर पर सजा दे रहा है। निवेशक अब भविष्य के वादों पर निर्भर कंपनियों के बजाय स्पष्ट कमाई, मजबूत वित्तीय सेहत और पैसे के सही इस्तेमाल की योजनाओं वाली कंपनियों को तरजीह दे रहे हैं।

कीमतों में क्यों आया बदलाव?

यह बदलाव सिर्फ एक छोटी अवधि की गिरावट नहीं, बल्कि एक स्थायी बदलाव माना जा रहा है। जानकारों की मानें तो इसके कई कारण हैं। कई IPOs की कीमत बहुत ज्यादा रखी गई थी, जिनमें भविष्य की कमाई को लेकर तस्वीर साफ नहीं थी या वे मौजूदा कैश फ्लो के बजाय भविष्य के वादों पर ज्यादा निर्भर थे। अब वह दौर खत्म हो गया है जब प्रमोटर और प्राइवेट इक्विटी फर्म आसानी से अच्छी वैल्यूएशन पा लेते थे। निवेशकों के लिए अब कंपनी का ब्रांड नाम से ज्यादा उसके फंडामेंटल्स मायने रखते हैं।

आर्थिक दबाव भी माहौल को मुश्किल बना रहा है। इसमें ग्लोबल संघर्ष, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और भारतीय रुपये का कमजोर होना शामिल है। 2026 की शुरुआत में रुपया लगभग ₹91-₹93 प्रति अमेरिकी डॉलर तक गिर गया है, जिससे इम्पोर्ट महंगा हुआ है और विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी कम हो सकती है। ऊंची ब्याज दरें भी कंपनियों के लिए कर्ज महंगा कर रही हैं और भविष्य के मुनाफे की आज की वैल्यू को कम कर रही हैं, जिससे कंपनियों की वैल्यूएशन घट रही है। हालांकि भारत की इकोनॉमी फंडामेंटली मजबूत है और ग्रोथ अच्छी है, लेकिन इन बाहरी वजहों से छोटी अवधि में अनिश्चितता बढ़ी है। भारतीय IPO मार्केट में ऐतिहासिक रूप से तेजी और मंदी के चक्र देखे गए हैं, जहां बहुत ऊंची कीमतों ने अक्सर बड़े नुकसान कराए हैं। आज, पूरा फोकस कंपनी के फंडामेंटल्स पर है, और औसत लिस्टिंग गेन 2018 के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर आ गए हैं।

रिन्यूएबल एनर्जी (Renewable Energy) जैसे सेक्टर, जिन्होंने अक्सर निवेशकों का भरोसा जीता है, वे अभी भी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। IREDA जैसी कंपनियां ठोस वित्तीय लाभ और विविध प्रोजेक्ट फंडिंग दिखा रही हैं। कैपिटल गुड्स (Capital Goods) और मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) से जुड़े बिजनेस भी मौके दे रहे हैं, जिन्हें 'मेक इन इंडिया' (Make in India) जैसी सरकारी योजनाओं और प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) का सहारा है, जो इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स बढ़ने के साथ लॉन्ग-टर्म ग्रोथ का वादा करते हैं। फिर भी, इन क्षेत्रों में भी सटीक प्राइसिंग (Pricing) जरूरी है। निवेशक अच्छी तरह से मैनेज की गई कंपनियों और बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई कीमतों वाली कंपनियों में फर्क कर रहे हैं।

कंपनियों और निवेशकों के लिए जोखिम

मार्केट की इस नई सतर्कता से शेयर जारी करने वाली कंपनियों और उन्हें खरीदने वाले निवेशकों, दोनों के लिए वास्तविक जोखिम खड़े हो गए हैं। एक बड़ी चिंता कीमतों की उम्मीदों में लगातार अंतर है। कंपनियों के मालिक अक्सर बुल मार्केट (Bull Market) के दौरान देखी गई ऊंची कीमतों पर ही टिके रहते हैं, जबकि निवेशक अब ग्लोबल संघर्ष के जोखिमों और संभावित प्रॉफिट (Profit) की दिक्कतों पर गौर कर रहे हैं। 'न्यू-एज' (New-Age) टेक कंपनियों पर निर्भरता, जिन्हें अक्सर मुनाफा मिलने में देर होने के बावजूद ऊंची कीमत मिल जाती है, जोखिम भरी हो सकती है यदि उनकी ग्रोथ की कहानियां लगातार आय और प्रॉफिट ग्रोथ में न बदलें। इसके अलावा, कमजोर भारतीय रुपया, जो कुछ एक्सपोर्टर्स जैसे IT और दवा कंपनियों के लिए अच्छा है, कई अन्य व्यवसायों के लिए इम्पोर्ट लागत बढ़ाता है। इससे उनका मुनाफा कम हो सकता है और महंगाई बढ़ सकती है। यदि ऊंची तेल कीमतें और ग्लोबल अस्थिरता जारी रहती है, तो यह कंपनी के मुनाफे को और नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे कई महंगे IPO लिस्टिंग के बाद तेजी से गिर सकते हैं। निवेशकों की बदली हुई भावनाएं FY26 में पिछले साल की तुलना में कम कुल शेयर सब्सक्रिप्शन (Subscription) और व्यक्तिगत निवेशकों (Retail Investors) की कम खरीदारी से साफ जाहिर होती हैं।

आगे क्या?

बाजार में इस बदलाव के बावजूद, कई कंपनियां अभी भी स्टॉक मार्केट में लिस्ट होने की योजना बना रही हैं। FY27 में 140 से ज्यादा कंपनियां करीब ₹1.75 लाख करोड़ जुटाने की तैयारी में हैं। यह FY26 में जुटाए गए रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ के बाद है। एक्सपर्ट्स FY27 के लिए उम्मीद भरा लेकिन सतर्क अनुमान लगा रहे हैं। पहले छह महीनों में ग्लोबल और आर्थिक बदलावों के चलते उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। हालांकि, दूसरे हाफ (Half) में रिकवरी की उम्मीद है, जिसमें भारतीय संस्थानों (Institutions) से आने वाला पैसा और कंपनियों के बढ़ते मुनाफे का योगदान होगा। उम्मीद है कि मार्केट सिर्फ निवेशक की भावनाओं से नहीं, बल्कि वास्तविक मुनाफे से चलेगा। जहां ऊंची ऊर्जा कीमतों जैसी बाहरी समस्याएं मुनाफे की ग्रोथ को खतरा पहुंचा सकती हैं, वहीं भारत की फंडामेंटली मजबूत इकोनॉमी और उचित वैल्यूएशन (Valuation) वाले स्टॉक, अपनी असल कीमत के आधार पर अच्छे शेयर चुनने वाले समझदार निवेशकों के लिए मौके दे सकते हैं।

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