IPO फाइलिंग में रिकॉर्ड का अंबार, पर निवेशक क्यों हैं बेफिक्र?
साल 2026 के वित्तीय वर्ष (FY26) के समापन पर भारतीय शेयर बाजार में इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) के लिए फाइलिंग की रफ्तार ने सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। दो दर्जन से ज़्यादा कंपनियों ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के पास अपने ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस (draft prospectus) जमा किए, जिससे आने वाले समय के लिए एक मजबूत IPO पाइपलाइन तैयार हो गई है। लेकिन, इन आंकड़ों के पीछे की कहानी थोड़ी अलग है: FY26 में रिकॉर्ड फंड जुटाया गया, लेकिन लिस्टिंग पर निवेशकों को औसतन -7% का घाटा हुआ, और रिटेल निवेशकों का उत्साह भी फीका पड़ गया।
मार्च में IPO फाइलिंग का तूफानी महीना
FY26 के अंतिम दिनों में IPO फाइलिंग की रफ्तार ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। अकेले मार्च 2026 में करीब 30 कंपनियों ने अपने ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस SEBI को सौंपे, जिनका लक्ष्य लगभग ₹60,000 करोड़ ($6.3 बिलियन) जुटाना था। Sadbhav Futuretech, TC Terrytex, Monomark Engineering, और Kay Jay Forgings जैसी कंपनियों ने अपने विस्तार योजनाओं, वर्किंग कैपिटल (working capital) की जरूरतों और मौजूदा कर्ज़ (debt repayment) चुकाने के लिए यह कदम उठाया। यह सब तब हुआ जब FY26 में प्रमुख सूचकांक Sensex और Nifty में 5% से ज़्यादा और 7% से ज़्यादा की गिरावट दर्ज की गई थी। हालांकि, 1 अप्रैल, 2026 को भू-राजनीतिक तनाव कम होने की खबरों के बीच वैश्विक बाजारों से मिले सकारात्मक संकेतों के चलते Nifty 1.56% बढ़कर 22,679.40 पर और Sensex 1.65% बढ़कर 73,134.32 पर बंद हुए।
रिकॉर्ड फंडरेज़िंग, पर घटता रिटर्न
FY26 के दौरान, कंपनियों ने 112 मेनबोर्ड IPOs के ज़रिए रिकॉर्ड ₹1.79 लाख करोड़ जुटाए, जो पिछले साल से 10% ज़्यादा है। यह लगातार दूसरे साल ऑल-टाइम हाई फंडरेज़िंग का रिकॉर्ड है। लेकिन, इस भारी-भरकम फंड जुटाने के साथ ही निवेशकों के रिटर्न में भारी गिरावट आई। FY26 में IPOs पर औसत लिस्टिंग गेन घटकर -7% रह गया, जो पिछले सालों के लगातार मुनाफे से बिल्कुल अलग है। जहाँ FY25 में 71% IPOs ने लिस्टिंग के दिन 10% से ज़्यादा का रिटर्न दिया था, वहीं FY26 में यह आंकड़ा गिरकर सिर्फ़ 31% रह गया। इस कमजोर प्रदर्शन ने निवेशकों का उत्साह कम कर दिया है, खासकर रिटेल निवेशकों का, जिनके आवेदन औसतन 40% कम हो गए। IPOs का औसत साइज भी FY26 में 23% घट गया, जो छोटे डील्स की ओर बढ़ता रुझान दिखाता है। क्षेत्र के वैल्यूएशन (valuation) की बात करें तो, BSE FMCG और Nifty FMCG का P/E रेशियो 31.4-32.6, BSE IT का 21.1, और Nifty India Manufacturing का 26.0 था, जबकि 31 मार्च 2026 को Sensex का P/E 19.780 था।
इन्वेस्टर क्यों हो रहे हैं सावधान?
IPO फाइलिंग की इस बढ़ोतरी के पीछे कई चुनौतियाँ छिपी हैं। FY26 में लिस्ट हुए IPOs पर औसत रिटर्न नकारात्मक -7% रहा, जिसने निवेशकों का भरोसा हिला दिया है। रिटेल निवेशक, जो अक्सर छोटे-मोटे मुनाफे के लिए IPOs का रुख करते थे, अब सावधान हो गए हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि जुटाए गए पैसों के इस्तेमाल का तरीका बदल गया है। FY26 में IPO से जुटाई गई कुल रकम का एक बड़ा 26% हिस्सा कर्ज़ चुकाने (debt repayment) के लिए इस्तेमाल किया गया, न कि सिर्फ़ तेज़ी से विस्तार के लिए। यह दर्शाता है कि कई कंपनियां अपनी मौजूदा देनदारियों को निपटाने के लिए IPO विंडो का फायदा उठा रही हैं। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक मुद्दे, बढ़ते कच्चे तेल के दाम और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के चलते FY26 के आखिर में शेयर बाजार कमजोर रहा। Rediff.com India Ltd और SNVA Traveltech जैसी कंपनियों द्वारा गोपनीय फाइलिंग (confidential filing) का विकल्प चुनना भी बाजार की सुस्ती की ओर इशारा करता है।
मजबूत पाइपलाइन, पर बाजार में सतर्कता
FY26 में कमजोर लिस्टिंग प्रदर्शन और बाजार की वर्तमान सतर्कता के बावजूद, भारतीय IPO पाइपलाइन बेहद मजबूत बनी हुई है। 2026 की शुरुआत तक, 144 कंपनियों को SEBI से लगभग ₹1.75 लाख करोड़ जुटाने की मंजूरी मिल चुकी है, और अतिरिक्त 63 कंपनियां ₹1.37 लाख करोड़ के लिए मंज़ूरी का इंतजार कर रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि साल के अंत तक बाजार में सुधार आ सकता है, जिससे निवेशकों का सेंटीमेंट (sentiment) फिर से बढ़ेगा और अच्छी लिस्टिंग के मौके बनेंगे। हालांकि FY26 ने निवेशकों को रिटर्न के मामले में निराश किया है, लेकिन भारतीय स्टॉक्स की लंबी अवधि की क्षमता पर अभी भी भरोसा है।