साल 2026 में बड़े लिस्टिंग्स के बावजूद भारत में IPO का औसत साइज घटकर **₹1,445 करोड़** रह गया है, जो पिछले साल **₹1,700 करोड़** था। बाजार में उतार-चढ़ाव और निवेशकों की बदलती पसंद के कारण कंपनियां अब छोटे और सुरक्षित इश्यू लाने पर मजबूर हैं।
साल 2026 में भारतीय IPO मार्केट में एक अलग तरह की तस्वीर देखने को मिल रही है। जनवरी से अक्टूबर के बीच 109 कंपनियों ने बाजार से ₹1,57,560 करोड़ जुटाए हैं, लेकिन इस भारी-भरकम आंकड़े के पीछे की सच्चाई यह है कि प्रति डील का औसत साइज काफी कम हो गया है।
मेगा-लिस्टिंग्स का असर
आंकड़े बताते हैं कि अगर हम Jio Platforms, National Stock Exchange (NSE), SBI Funds Management और Manipal Health Enterprises जैसी बड़ी लिस्टिंग्स को हटा दें, तो बाकी कंपनियों के IPO का औसत साइज गिरकर महज ₹820 करोड़ रह जाता है। यह साफ दिखाता है कि निवेशक अब सिर्फ दिग्गज कंपनियों पर ही दांव लगाना पसंद कर रहे हैं, जबकि मिड-साइज कंपनियों के लिए पूंजी जुटाना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
मार्केट में उतार-चढ़ाव का सामना
इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों (FIIs) का पैसा निकालना और भू-राजनीतिक अनिश्चितता (geopolitical uncertainty) है। बाजार में छाई इस सावधानी के चलते कंपनियां अपनी वैल्यूएशन को लेकर सतर्क हैं और छोटे इश्यू साइज के साथ बाजार में उतर रही हैं ताकि उनके IPO को अच्छी सब्सक्रिप्शन मिल सके।
SEBI का सुरक्षा कवच
कंपनियों को राहत देने के लिए SEBI ने एक अहम नियम को 31 मार्च, 2027 तक बढ़ा दिया है। इसके तहत कंपनियां अपने फ्रेश इश्यू साइज को 50% तक बिना नया ड्राफ्ट फाइल किए बदल सकती हैं। यह कदम कंपनियों को मार्केट सेंटीमेंट के हिसाब से अपनी प्लानिंग बदलने की आजादी देता है।
निवेशकों के लिए संकेत
बाजार में अब प्राइस सेंसिटिविटी बढ़ गई है। कंपनियां बड़ी महत्वाकांक्षाओं के बजाय 'लिस्टिंग सक्सेस' को प्राथमिकता दे रही हैं। निवेशकों को अब यह ट्रैक करना होगा कि क्या छोटे इश्यू का यह ट्रेंड जारी रहता है या बाजार की स्थिति सुधरने पर हम फिर से बड़े IPOs देख पाएंगे।
