IPO फाइलिंग में रिकॉर्ड तेज़ी, पर क्यों है बाज़ार में नरमी?
साल 2026 के मार्च में, भारत के प्राइमरी मार्केट में IPO फाइलिंग में ज़बरदस्त तेज़ी देखी गई। लगभग 30 कंपनियों ने अपने ड्राफ्ट प्रॉस्पेक्टस (draft prospectus) जमा किए हैं, जो कुल मिलाकर करीब ₹600 बिलियन (या $6.3 बिलियन) जुटाना चाहते हैं। यह रिकॉर्ड महीनों में दूसरा सबसे व्यस्त महीना रहा, जो जुलाई 2025 के बाद सबसे बड़ा था।
यह तेज़ी तब आई है जब शेयर बाज़ार में नरमी बनी हुई है और निवेशकों का सेंटिमेंट (sentiment) सतर्क है। मार्च 2026 में, Nifty 50 और Sensex जैसे प्रमुख इंडेक्स में 5% और 7% से ज़्यादा की गिरावट दर्ज की गई। इन बाज़ारी उतार-चढ़ावों के पीछे पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, बढ़ती तेल की कीमतें और फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FII) का बड़ा आउटफ्लो (outflow) जैसे कारण रहे।
वैश्विक रुझान और पिछला प्रदर्शन
वैश्विक IPO मार्केट की बात करें तो 2026 की पहली तिमाही मिली-जुली रही। हांगकांग (Hong Kong) फंड जुटाने में आगे रहा, जबकि अमेरिका में बड़े IPOs पर सबकी नज़रें थीं। कुल मिलाकर, अनिश्चित ब्याज दरों (interest rates) और भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण वैश्विक IPO मार्केट पिछले कुछ सालों की तुलना में धीमा रहा। भारत की यह मज़बूत फाइलिंग एक्टिविटी (activity) वैश्विक रुझान के विपरीत है। ऐतिहासिक रूप से, भारत के शेयर बाज़ार में करेक्शन (correction) के दौर अक्सर प्राइमरी मार्केट में गतिविधि बढ़ने का संकेत देते हैं, क्योंकि कंपनियां संभावित रिकवरी (recovery) के लिए खुद को तैयार करती हैं।
रणनीतिक इश्यूअर्स और आर्थिक संकेत
कंपनियां साल 2026 के दूसरे हाफ (half) में बाज़ार में संभावित सुधार का फायदा उठाने के लिए रणनीतिक कदम उठा रही हैं। मार्च में कुछ प्रमुख फाइलिंग्स में SBI Funds Management Ltd. शामिल है, जिसका लक्ष्य $1.5 बिलियन तक जुटाना है, और Manipal Hospitals, जो करीब $1 बिलियन की मांग कर रहा है। Zetwerk Pvt., PGP Glass Pvt., और Torrent Gas Ltd. जैसी कंपनियों ने भी महत्वपूर्ण कैपिटल रेज (capital raise) के लिए ड्राफ्ट पेपर जमा किए।
यह कदम भारत के अपेक्षाकृत मज़बूत आर्थिक आउटलुक (outlook) से भी प्रभावित है। 2026 में भारत की जीडीपी ग्रोथ (GDP growth) के अनुमान अलग-अलग थे, कुछ अनुमान 5.9% थे (भू-राजनीतिक कारकों के कारण संशोधित) और कुछ 6.9% और 6.5% तक थे। डोमेस्टिक डिमांड (domestic demand) और इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) खर्च इसमें सहारा दे रहे हैं। हालांकि, भू-राजनीतिक घटनाएं और तेल की बढ़ती कीमतें महंगाई और सरकारी खर्चों के लिए जोखिम पैदा करती हैं।
जोखिम और निवेशकों की सतर्कता
IPO फाइलिंग की ऊंची संख्या के बावजूद, बाज़ार की मौजूदा स्थिति कई जोखिम पेश करती है। कंपनियों की लिस्टिंग की महत्वाकांक्षाओं और शेयर बाज़ार के वर्तमान प्रदर्शन के बीच एक बड़ा गैप (gap) चिंता का विषय है। पिछले साल लिस्ट हुई लगभग 65% कंपनियां अपने इश्यू प्राइस (issue price) से नीचे ट्रेड कर रही हैं, और भारतीय शेयर बाज़ार फाइनेंशियल ईयर 2026 को बड़ी गिरावट के साथ समाप्त कर रहे हैं। ऐसे में, इश्यूअर्स (issuers) बाज़ार में मज़बूत और तेज़ रिकवरी की उम्मीद कर रहे हैं।
अगर यह रिकवरी नहीं हुई, तो इन कंपनियों को अच्छे प्राइस पर लिस्ट होने में मुश्किल हो सकती है, जिससे वैल्यूएशन (valuation) कम हो सकती है और फंड जुटाने के लक्ष्य अधूरे रह सकते हैं। मार्च 2026 में फॉरेन इन्वेस्टर्स (foreign investors) के भारी आउटफ्लो ने भी सतर्कता दिखाई है और यह नए शेयरों की मांग को सीमित कर सकता है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक अस्थिरता भी एक लगातार खतरा है जो IPO शेड्यूल को बाधित कर सकता है और तेल की ऊंची कीमतों व कमज़ोर करेंसी जैसी आर्थिक समस्याओं को बढ़ा सकता है, जिससे नई कंपनियों को नुकसान हो सकता है। 2026 की शुरुआत में IPOs का प्रदर्शन इस सतर्कता को दर्शाता है, जहां मार्च तक 11 मेनबोर्ड IPOs में से सात ने पहले दिन ट्रेडिंग में खराब या नकारात्मक रिटर्न दिया।
रिकवरी की उम्मीद
बाज़ार के विश्लेषक 2026 के दूसरे हाफ के लिए उम्मीद बनाए हुए हैं। उनका अनुमान है कि IPO फाइलिंग्स का यह बड़ा पाइपलाइन (pipeline) भारत के प्राइमरी मार्केट को फिर से जीवंत करेगा और साल के अंत तक रिकॉर्ड कैपिटल रेज (capital raises) संभव हो सकते हैं। भले ही भू-राजनीतिक मुद्दे अस्थायी देरी का कारण बन सकते हैं, भारतीय शेयरों के लिए मुख्य निवेश की दलील (investment case) मज़बूत मानी जाती है।
IMF का अनुमान है कि भारत 2026 में वैश्विक जीडीपी ग्रोथ में महत्वपूर्ण योगदान देगा, जिससे यह एक प्रमुख निवेश केंद्र के रूप में अपनी भूमिका को मज़बूत करेगा।