IPO की बहार, पर बाज़ार में मायूसी
फाइनेंशियल ईयर 2026 के अंत में भारतीय इक्विटी मार्केट में एक बड़ा अंतर देखने को मिला। जहां प्राइमरी मार्केट में रिकॉर्ड IPO गतिविधियां हुईं, वहीं सेकेंडरी मार्केट की तस्वीर फीकी रही। कंपनियों ने 112 मेनबोर्ड IPOs के ज़रिये ऐतिहासिक ₹1.79 लाख करोड़ जुटाए, जो लगभग तीन दशकों में सबसे ज्यादा है। यह प्राइमरी मार्केट की सफलता, व्यापक मार्केट के प्रदर्शन के बिल्कुल विपरीत थी, जहां 71% एक्टिवली ट्रेडेड शेयरों ने फाइनेंशियल ईयर को गिरावट के साथ खत्म किया। Capitaline के डेटा के अनुसार, 3,796 में से 2,705 शेयरों के भाव साल के अंत में नीचे थे, जिनमें से एक तिहाई से ज़्यादा 30% से ज़्यादा गिरे। यह पिछले सालों से अलग था, जहां मजबूत IPO माहौल आमतौर पर व्यापक मार्केट की मजबूती से जुड़ा होता था। बेंचमार्क इंडेक्स, निफ्टी 50 और सेंसेक्स में भी इस फाइनेंशियल ईयर में क्रमशः लगभग 5% और 7% की मामूली गिरावट दर्ज की गई।
बाहरी झटके और वैल्यू में गिरावट
मार्केट में इस व्यापक कमजोरी के पीछे बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक चुनौतियों का बड़ा हाथ था। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष, अमेरिकी टैरिफ और सप्लाई चेन में लगातार रुकावटों ने निवेशकों के सेंटिमेंट को कमजोर किया। मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ने के बीच ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $82 प्रति बैरल के पार चली गईं और कुछ समय तो $120-150 तक पहुंचने के करीब थीं। कच्चे तेल की इस बढ़त ने महंगाई और कॉरपोरेट मार्जिन पर दबाव डाला। इसके साथ ही, रुपये में भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारी गिरावट देखी गई। फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) भारतीय इक्विटी से लगातार पैसा निकालते रहे, जिससे सेकेंडरी मार्केट में बिकवाली का दबाव और बढ़ गया। इन सब वजहों से मार्च 2026 में निफ्टी 50 ने पिछले 6 सालों में अपनी सबसे बड़ी मासिक गिरावट दर्ज की।
लिस्टिंग परफॉरमेंस: उम्मीदों पर पानी
हालांकि, FY26 में रिकॉर्ड IPO फंडरेज़िंग पर नए लिस्ट हुए शेयरों के खराब प्रदर्शन का साया मंडराता रहा। साल भर में औसत लिस्टिंग गेन घटकर करीब 8% रह गया, जबकि FY25 में यह 30% था। चिंता की बात यह है कि मार्च 2026 के अंत तक, FY26 में पब्लिक हुए 65-75% से ज़्यादा IPOs अपने इश्यू प्राइस (Issue Price) से नीचे ट्रेड कर रहे थे, और कुछ तो लिस्टिंग वाले दिन ही गिर गए थे। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि बहुत ज़्यादा वैल्यूएशन (Valuations) और पोटेंशियल मिसप्राइजिंग (Mispricing) इसके पीछे की मुख्य वजहें हैं।
बाज़ार का अंतर: वैल्यूएशन और रिस्क
FY26 में रिकॉर्ड प्राइमरी मार्केट और गिरते सेकेंडरी मार्केट के बीच यह बड़ा अंतर (Disconnect) बाजार की स्थिरता और कंपनियों की रणनीति पर सवाल खड़े करता है। ऐसा लगता है कि कंपनियां गिरावट से पहले या कमज़ोर होती निवेशक मांग का फायदा उठाने के लिए पब्लिक मार्केट में तेजी से पहुंचीं, भले ही मौजूदा शेयरधारकों को नुकसान हो रहा था। सप्लाई में यह बढ़त, हाई वैल्यूएशन और भू-राजनीतिक जोखिमों से डरे हुए निवेशकों के कारण लिस्टिंग परफॉरमेंस कमजोर रहा। पश्चिम एशिया संघर्ष और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जैसे बाहरी झटकों ने जोखिमों को और बढ़ा दिया।
FY27 का आउटलुक: सावधानी के साथ उम्मीद
FY27 को लेकर, विश्लेषकों का अनुमान है कि भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था के दम पर IPO पाइपलाइन मजबूत बनी रहेगी। अनुमान है कि $20 बिलियन तक का फंड जुटाया जा सकता है, जिसमें करीब 150 कंपनियां ₹2.5-4 लाख करोड़ तक का निवेश आकर्षित कर सकती हैं। अब सारा ध्यान वॉल्यूम (Volume) के बजाय 'क्वालिटी, स्केल और प्राइसिंग डिसिप्लिन' पर रहने की उम्मीद है। फाइनेंशियल सर्विसेज, कंज्यूमर टेक, डिजिटल प्लेटफॉर्म, मैन्युफैक्चरिंग और हेल्थकेयर जैसे सेक्टरों में निवेशकों की दिलचस्पी बनी रहेगी। हालांकि, भू-राजनीतिक तनाव और FPI फ्लो जैसे जोखिम बने रहेंगे।