भारत की दिग्गज फिनटेक कंपनियां अपने पब्लिक लिस्टिंग प्लान को टाल रही हैं। करीब ₹33,600 करोड़ के IPO पाइपलाइन में देरी की मुख्य वजह MDR नियमों को लेकर अनिश्चितता और बाजार की अस्थिरता है। अब निवेशक 'ग्रोथ' से ज्यादा 'मुनाफे' पर जोर दे रहे हैं।
MDR का पेंच और कमाई की चुनौती
फिनटेक सेक्टर में IPO की रफ्तार धीमी होने का सबसे बड़ा कारण UPI ट्रांजैक्शन पर MDR (Merchant Discount Rate) को लेकर बनी अनिश्चितता है। वर्तमान में UPI पर जीरो MDR स्ट्रक्चर है, जिससे भुगतान सेवा देने वाली कंपनियों के लिए रेवेन्यू मॉडल बनाना मुश्किल हो गया है। पब्लिक मार्केट के निवेशक ऐसी कंपनियों पर दांव लगाने से कतरा रहे हैं, जहां भविष्य की कमाई का कोई स्पष्ट खाका नहीं है।
बाजार का बदलता मूड
कुछ साल पहले तक निवेशक 'ग्रोथ-एट-ऑल-कॉस्ट' मॉडल को पसंद करते थे, लेकिन अब माहौल बदल गया है। अब बाजार उन्हीं कंपनियों को तरजीह दे रहा है जो न केवल स्केल दिखा रही हैं, बल्कि जिनका बिजनेस मॉडल सस्टेनेबल और प्रॉफिटेबल भी है। निवेशकों को अब केवल तेजी नहीं, बल्कि लगातार कई तिमाहियों के मजबूत फाइनेंशियल आंकड़े चाहिए, ताकि वैल्यूएशन को सही ठहराया जा सके।
प्रमुख कंपनियों की स्थिति
PhonePe, Razorpay और Upstox जैसी दिग्गज कंपनियां फिलहाल जोखिमों को भांपते हुए फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं। हालांकि, अपवाद के तौर पर Fibe ने अपने ₹750 करोड़ के IPO के लिए रेगुलेटरी ऑब्जर्वेशन हासिल कर लिए हैं, जो दिखाता है कि कुछ कंपनियां विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ रही हैं।
वेंचर कैपिटल और एग्जिट का दबाव
IPO में देरी का सीधा असर उन वेंचर कैपिटल फर्मों पर पड़ रहा है जिन्होंने इन कंपनियों में शुरुआती निवेश किया था। लिस्टिंग टलने से उनका 'एग्जिट' टाइमलाइन पीछे खिसक गया है। अब ये कंपनियां लिक्विडिटी के लिए सेकेंडरी शेयर सेल या प्राइवेट फंडिंग राउंड्स जैसे विकल्पों पर विचार कर रही हैं। अब निवेशकों की नजर पूरी तरह से रेगुलेटर्स के फैसले पर है, क्योंकि MDR पर स्पष्टता आने के बाद ही कंपनियां अपने फाइनेंशियल मॉडल्स को सही रूप दे पाएंगी।
