भारतीय आईपीओ (IPO) बाजार के समीकरण बदल रहे हैं। वैल्युएशन को लेकर चिंता के चलते भारतीय आईपीओ के एंकर बुक्स में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की भागीदारी घटकर **36.16%** के **5 साल** के निचले स्तर पर आ गई है।
भारतीय प्राइमरी मार्केट का चेहरा बदल रहा है। साल 2021 में एंकर बुक्स में 62.75% की हिस्सेदारी रखने वाले FPIs अब पीछे हट रहे हैं। साल 2026 में उनका आंकड़ा गिरकर 36.16% पर सिमट गया है।\n\n### विदेशी बिकवाली और ग्लोबल कारण\nयह बदलाव विदेशी और घरेलू निवेशकों की बदलती मानसिकता को दर्शाता है। केवल साल 2026 में ही FPIs ने भारतीय शेयर बाजार से करीब ₹3.08 लाख करोड़ की निकासी की है। इसके पीछे अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और ग्लोबल फंड्स का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे टेक्नोलॉजी-हैवी सेक्टर की तरफ शिफ्ट होना मुख्य कारण है।\n\n### घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) का दबदबा\nविदेशी निकासी के बीच DIIs यानी म्यूचुअल फंड्स और इंश्योरेंस कंपनियां बाजार के लिए एक 'सेफ्टी नेट' बनकर उभरी हैं। इसका सबसे बड़ा कारण SIPs के जरिए आने वाला रिकॉर्ड पैसा है, जो सितंबर 2026 में ₹32,490 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया।\n\nघरेलू संस्थानों की इस बढ़ती ताकत ने कंपनियों को आईपीओ की कीमत तय करने के मामले में ज्यादा अनुशासित बना दिया है। यही कारण है कि 2026 में नए आईपीओ का औसत P/E मल्टीपल पिछले साल के मुकाबले करीब 40% तक गिर गया है।\n\n### अभी भी है सिलेक्टिव दिलचस्पी\nहालांकि, विदेशी निवेशक पूरी तरह भारत से बाहर नहीं गए हैं। इसका सबूत Jio Platforms का हालिया आईपीओ है, जो करीब ₹30,213 करोड़ का था। इसे निवेशकों से तगड़ा रिस्पॉन्स मिला, जो यह साबित करता है कि हाई-ग्रोथ वाली कंपनियों में ग्लोबल कैपिटल अभी भी रुचि ले रही है।\n\n### जोखिम और नजर रखने वाली बातें\nबाजार की मजबूती फिलहाल घरेलू लिक्विडिटी पर टिकी है। 12.5% का LTCG टैक्स और SEBI द्वारा ऑनबोर्डिंग नॉर्म्स की समीक्षा जैसे कदम भविष्य में काफी अहम होंगे। प्राइमरी मार्केट की आगे की चाल इस बात पर निर्भर करेगी कि वैल्युएशन कितनी आकर्षक रहती है और क्या विदेशी निवेशक दोबारा भारत का रुख करते हैं या नहीं।
