Equirus Capital के फाउंडर अजय गर्ग का मानना है कि भारतीय IPO मार्केट अब केवल लिस्टिंग गेन पर फोकस नहीं कर रहा, बल्कि वैल्यू क्रिएशन की ओर बढ़ रहा है। घरेलू संस्थागत निवेशकों की बढ़ती सक्रियता से प्राइस डिसिप्लिन आया है, लेकिन कंपनियों को वैल्यूएशन पर सतर्क रहने की जरूरत है।
भारतीय प्राइमरी मार्केट अब एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। अब निवेशक लिस्टिंग डे के मुनाफे के बजाय लॉन्ग-टर्म वैल्यू क्रिएशन पर ध्यान दे रहे हैं। Equirus Capital के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर अजय गर्ग के अनुसार, इस बदलाव के पीछे का सबसे बड़ा कारण भारत का मजबूत 'घरेलू कैपिटल बेस' है। जहां पहले विदेशी निवेशक मार्केट की दिशा तय करते थे, वहीं अब म्यूचुअल फंड्स और घरेलू संस्थागत निवेशकों का पैसा बाजार को मजबूती दे रहा है।
घरेलू निवेशकों का दबदबा और प्राइस डिसिप्लिन
म्यूचुअल फंड्स और अन्य घरेलू संस्थानों की तरफ से हर महीने आ रहे निवेश ने मार्केट की डिमांड साइड को काफी स्टेबल कर दिया है। इससे बाजार अब ग्लोबल मार्केट के उतार-चढ़ाव से कम प्रभावित होता है। गर्ग का मानना है कि इससे प्राइसिंग में अनुशासन (Price Discipline) आया है। अब निवेशक वैल्युएशन पर ज्यादा मोल-भाव कर रहे हैं, जिससे कंपनियों को अपनी कीमतों को सही ढंग से पेश करना पड़ता है।
फैमिली बिजनेस में प्रोफेशनल गवर्नेंस
प्राइसिंग के अलावा, प्रमोटर्स का नजरिया भी बदला है। अब पारिवारिक कंपनियां सिर्फ पूंजी जुटाने के लिए नहीं, बल्कि मार्केट-आधारित गवर्नेंस फ्रेमवर्क अपनाने के लिए पब्लिक मार्केट में आ रही हैं। यह बदलाव प्रमोटर्स को ऑपरेशनल भूमिकाओं से हटाकर लॉन्ग-टर्म शेयरहोल्डर्स के रूप में स्थापित कर रहा है, जिससे भविष्य में बेहतर वैल्यू क्रिएशन की उम्मीद है।
जोखिम और सतर्कता
बाजार का रुख सकारात्मक है, लेकिन गर्ग ने कुछ जोखिमों की ओर भी इशारा किया है। भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी कमोडिटी की कीमतों और एनर्जी पर काफी निर्भर है, जिससे कॉर्पोरेट मार्जिन पर असर पड़ सकता है। निवेशकों को सलाह दी गई है कि वे IPO को शॉर्ट-टर्म गैंबलिंग न समझें। यदि कंपनियां अपनी परफॉर्मेंस से ज्यादा प्रीमियम दाम मांगती हैं, तो यह लंबे समय में निवेशकों के पैसे का नुकसान करा सकता है। आने वाले समय में मार्केट का असली टेस्ट यही होगा कि बढ़ती लिस्टिंग के बीच कंपनियां वैल्युएशन का यह अनुशासन कैसे बनाए रखती हैं।
