FY27 के लिए भारतीय प्राइमरी मार्केट में बहार आने वाली है! **250** से ज्यादा कंपनियां **₹1.75 लाख करोड़** जुटाने की तैयारी में हैं। BSE के CEO सुंदररमन राममूर्ति का कहना है कि डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इनफ्लो (Domestic Institutional Inflow) विदेशी निवेशकों की बिकवाली और ग्लोबल अनिश्चितताओं के बीच एक मजबूत सहारा दे रहे हैं।
मार्केट का मिजाज और IPO की कतार
FY27 की ओर बढ़ते हुए, भारतीय IPO मार्केट में गजब की मजबूती दिख रही है। भू-राजनीतिक तनाव और फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) की बिकवाली जैसी वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद, नए लिस्टिंग के लिए कंपनियों का पाइपलाइन (Pipeline) मजबूत बना हुआ है। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के आंकड़ों के मुताबिक, 250 से ज्यादा कंपनियां फिलहाल अप्रूवल (Approval) लेने या अपने IPO लॉन्च करने की तैयारी में हैं। ये कंपनियां आने वाले साल में सामूहिक रूप से करीब ₹1.75 लाख करोड़ जुटाने का लक्ष्य रख रही हैं।
यह पिछले फाइनेंशियल ईयर (FY26) के रिकॉर्ड-तोड़ प्रदर्शन के बाद हो रहा है, जब BSE के मेन बोर्ड (Main Board) और SME (Small and Medium Enterprise) प्लेटफॉर्म पर 255 IPO लिस्ट हुए थे, जिनसे कुल मिलाकर लगभग ₹1.8 लाख करोड़ जुटाए गए थे। लगातार आती एप्लीकेशन्स (Applications) इस बात का संकेत देती हैं कि कंपनियां भारतीय बाजार से कैपिटल (Capital) जुटाने को लेकर आश्वस्त हैं, भले ही वैश्विक सेंटिमेंट (Sentiment) सतर्क हो।
मार्केट की स्थिरता में आया बड़ा बदलाव
भारतीय मार्केट में सबसे बड़ा बदलाव डोमेस्टिक निवेशकों के बढ़ते प्रभाव का है। सालों तक, भारतीय शेयर बाजार विदेशी पैसों पर बहुत ज्यादा निर्भर रहा, जिससे ग्लोबल सेंटिमेंट में जरा सी भी नरमी आने पर यह कमजोर पड़ जाता था। BSE के CEO सुंदररमन राममूर्ति ने इस बात पर जोर दिया कि अब यह ट्रेंड बदल रहा है। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Domestic Institutional Investors), रिटेल पार्टिसिपेशन (Retail Participation) के लगातार सपोर्ट से, अब मार्केट को स्थिर रखने वाली एक बड़ी ताकत बन गए हैं।
इस बदलाव का मतलब यह है कि FPI आउटफ्लो (Outflow) से भले ही थोड़े समय के लिए कीमतों पर दबाव आए, लेकिन मार्केट में झटकों को झेलने की आंतरिक क्षमता बढ़ी है। निवेशक अब विदेशी पूंजी प्रवाह पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय, भारतीय अर्थव्यवस्था के व्यापक मैक्रो फंडामेंटल्स (Macro Fundamentals) जैसे कि अनुकूल जनसांख्यिकी (Demographics) और बढ़ती वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy) को लंबी अवधि के विकास के मुख्य चालक के रूप में देख रहे हैं।
रेगुलेटरी और मार्केट का माहौल
मार्केट पार्टिसिपेंट्स (Market Participants) फिलहाल कई रेगुलेटरी बदलावों (Regulatory Changes) से गुजर रहे हैं, जिनका मकसद लंबी अवधि में मार्केट को मजबूत बनाना है। इनमें डेरिवेटिव्स (Derivatives) पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में बढ़ोतरी और मार्केट पार्टिसिपेंट्स को लोन (Lending) देने को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए दिशानिर्देश शामिल हैं। हालांकि ये कदम लिक्विडिटी (Liquidity) या ट्रेडिंग वॉल्यूम (Trading Volumes) में थोड़े समय के लिए समायोजन पैदा कर सकते हैं, लेकिन एक्सचेंज का नेतृत्व इन्हें मार्केट की लचीलता (Resilience) को बेहतर बनाने और गंभीर, लंबी अवधि के निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक कदम मानता है।
एक ऐसे एक्सचेंज-एग्नोस्टिक मार्केट (Exchange-agnostic market) के लिए भी जोर-शोर से प्रयास चल रहे हैं, जहां निवेशक किसी भी प्लेटफॉर्म पर ट्रेड करें, उन्हें सबसे अच्छी उपलब्ध कीमत मिल सके। इस उद्देश्य का लक्ष्य सभी मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए लिक्विडिटी और प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) को बढ़ाना है, यह सुनिश्चित करते हुए कि मार्केट कुशल और प्रतिस्पर्धी बना रहे।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
निवेशकों के लिए, मुख्य बात यह होगी कि IPO पाइपलाइन (Pipeline) का कितना हिस्सा वास्तव में पब्लिक इश्यू (Public Issues) में बदलता है। हालांकि फंड जुटाने का इरादा बहुत मजबूत है, लेकिन इन IPOs की अंतिम टाइमिंग मार्केट की स्थितियों और कंपनियों के वैल्यूएशन्स (Valuations) पर निर्भर करेगी। निवेशकों को यह जानने के लिए कि क्या मार्केट की भूख पाइपलाइन के अनुसार मजबूत बनी हुई है, इन आगामी इश्यूज की वास्तविक लॉन्च डेट्स (Launch Dates) और प्राइसिंग (Pricing) पर नजर रखनी चाहिए। इसके अलावा, डोमेस्टिक इनफ्लो (Domestic Inflows) के ट्रेंड पर नजर रखना, किसी भी संभावित वैश्विक बाधाओं के सामने मार्केट की स्थिरता का एक महत्वपूर्ण संकेतक बना रहेगा।
