क्या खत्म हुआ 28 साल पुराना डिजिटल ड्यूटी बैन?
विश्व व्यापार संगठन (WTO) का इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर 28 सालों से चला आ रहा कस्टम ड्यूटी न लगाने का समझौता (moratorium) 31 मार्च 2026 को आधिकारिक तौर पर समाप्त हो गया है। कैमरून में हुई 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक (MC14) में गतिरोध के कारण यह अवधि 1998 से ड्यूटी-फ्री डिजिटल ट्रेड को जारी रखने में विफल रही। अब 6 मई 2026 से जेनेवा में शुरू होने वाली WTO की जनरल काउंसिल की बैठक में इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा होगी। भारत ने संकेत दिया है कि वह एक विस्तारित प्रतिबंध का समर्थन करने को तैयार है, लेकिन केवल तभी जब कुछ देशों के बीच होने वाले सौदे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए मजबूत सुरक्षा उपायों के साथ हों।
भारत की प्राथमिकता: रेवेन्यू और पॉलिसी स्पेस
ई-कॉमर्स पर ड्यूटी बैन को लेकर भारत का रुख दो मुख्य चिंताओं पर केंद्रित है: विकासशील देशों के लिए संभावित राजस्व की सुरक्षा और नीतिगत लचीलापन (policy space) बनाए रखना। नई दिल्ली का तर्क है कि ये कस्टम ड्यूटी उसके वित्तीय स्वास्थ्य के लिए और स्थानीय डिजिटल व्यवसायों को बड़े वैश्विक प्रतिस्पर्धियों से बचाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत का मानना है कि 28 साल का ड्यूटी-फ्री डिजिटल व्यापार मुख्य रूप से विकसित देशों के डिजिटल निर्यात को ही लाभ पहुंचा रहा है, और यह अवधि इस व्यापार के आर्थिक प्रभाव का पूरी तरह से आकलन करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। इसलिए, भारत कुछ चुनिंदा देशों के बीच अलग समझौतों के बजाय वैश्विक WTO वार्ता को प्राथमिकता देता है।
बौद्धिक संपदा नियम का चूकना और बढ़ते व्यापार विवादों का खतरा
डिजिटल व्यापार पर ड्यूटी बैन की समाप्ति के साथ-साथ, बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) से संबंधित एक नियम का चूकना भी स्थिति को और जटिल बना रहा है। IP नियम की सुरक्षा समाप्त होने से सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्रौद्योगिकी तक पहुंच जैसी नीतियों को लेकर WTO में विवाद खड़े हो सकते हैं। अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख देश ड्यूटी-फ्री अवधि को सुचारू डिजिटल व्यापार और नवाचार के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं, वहीं अमेरिका ने संकेत दिया है कि यदि वैश्विक समझौता विफल रहता है तो वह अलग समझौते कर सकता है। इससे डिजिटल अर्थव्यवस्था विभिन्न राष्ट्रीय नियमों में बंट सकती है और नई व्यापार बाधाएं खड़ी हो सकती हैं, जिससे वैश्विक डिजिटल बाज़ार खंडित हो सकता है। दुनिया भर के 66 WTO सदस्य नए ई-कॉमर्स समझौते (ECA) का समर्थन करते हैं, लेकिन इसमें महत्वपूर्ण प्रावधानों का अभाव है। इस प्रतिबंध के हटने से डिजिटल व्यापार धीमा हो सकता है और विकासशील देशों के लिए लागत बढ़ सकती है। भारत का विकासशील देशों के साथ मिलकर राजस्व संबंधी चिंताओं पर जोर देना, डिजिटल व्यापार नीति में बड़े अंतर को दिखाता है। जेनेवा में होने वाली वार्ता डिजिटल व्यापार के भविष्य की दिशा तय करेगी।
