अमेरिका की टैरिफ पॉलिसी पर कोर्ट का फैसला
अमेरिका में टैरिफ से जुड़े कई अदालती फैसलों ने व्यापार नीति को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। हाल ही में, 'यू.एस. कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड' ने प्रशासन के 10% ग्लोबल टैरिफ को गैर-कानूनी बताया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' (IEEPA) के तहत लगाए गए टैरिफ को रद्द कर दिया था। कोर्ट का मानना है कि प्रशासन ने टैरिफ लगाने के लिए जरूरी 'बड़े और गंभीर' भुगतान संतुलन घाटे (balance-of-payments deficits) के संकेत नहीं दिए।
हालांकि, यह फैसला कुछ खास वादी (plaintiffs) के लिए राहत लाया है, लेकिन यह पूरे देश में लागू नहीं है। इसका मतलब है कि ज्यादातर इम्पोर्टर्स के लिए टैरिफ अभी भी लागू हैं, जिससे व्यापारिक माहौल अनिश्चित बना हुआ है। इस कानूनी अनिश्चितता के कारण भारत के लिए अमेरिका के साथ ट्रेड डील को अंतिम रूप देना और भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि बातचीत का आधार एक स्थिर नीतिगत ढांचा है।
अनिश्चितता के बीच भारत की पोजीशन
अमेरिका में टैरिफ को लेकर चल रहे कानूनी विवाद के बावजूद, एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह भारत की बातचीत की स्थिति को मजबूत कर सकता है। भारत खुद को एक स्थिर, नियमों पर आधारित व्यापारिक साझेदार के तौर पर पेश कर सकता है, जबकि अमेरिका की अपनी ही नीतिगत उठापटक जारी है।
अमेरिकी डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट, क्रिस्टोफर लैंडौ (Christopher Landau), का कहना है कि दोनों देश 500 बिलियन डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार के लक्ष्य को 2030 तक हासिल करने के करीब हैं। बातचीत कई महीनों से चल रही है। इस साल की शुरुआत में तय हुए ढांचे में कई अहम टैरिफ समायोजन शामिल थे, जिसमें अमेरिका भारतीय सामानों पर टैरिफ कम करने पर सहमत हुआ था। हालांकि, कानूनी झटकों ने डील को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया को जटिल बना दिया है।
एकतरफा डील और नीतिगत उलटफेर का खतरा
अमेरिका में टैरिफ पर जारी कानूनी लड़ाई भारत की व्यापार रणनीति के लिए बड़े जोखिम पैदा करती है। जीटीआरआई (GTRI) के अजय श्रीवास्तव (Ajay Srivastava) जैसे एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि बार-बार अदालतों द्वारा अमेरिकी टैरिफ को अमान्य ठहराया जाना, भारत के लिए लंबी अवधि की व्यापारिक प्रतिबद्धताओं को सही ठहराना मुश्किल बना सकता है। उनकी सलाह है कि अमेरिका की व्यापार नीति में स्थिरता आने तक 'इंतजार करो और देखो' (wait and watch) की रणनीति अपनाई जाए।
चिंता इस बात की है कि भारत एकतरफा डील पर सहमति दे सकता है, जिसमें वह स्थायी बाजार पहुंच (market access) की रियायतें दे दे, लेकिन बदले में उसे बराबर टैरिफ लाभ न मिले। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका अपने 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) टैरिफ को कम करने के बजाय भारत पर कटौती का दबाव बना रहा है। साथ ही, अमेरिकी प्रशासन टैरिफ पावर पर कानूनी सीमाएं झेलने के बाद, संरक्षणवादी उपायों (protectionist measures) को लागू करने के लिए वैकल्पिक कानूनी रास्ते खोज सकता है, जिससे नीतिगत उलटफेर का खतरा बना रहेगा।
डायवर्सिफिकेशन: एक रणनीतिक जरूरत
भारत की व्यापार रणनीति में द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) का पीछा करने के साथ-साथ व्यावहारिक विचारों को संतुलित करना महत्वपूर्ण है। अमेरिकी व्यापार नीति की अस्थिर प्रकृति को देखते हुए, भारत को अपने व्यापारिक साझेदारों में विविधता (diversification) लाने की तत्काल आवश्यकता है।
यूरोपीय संघ (European Union - EU) और यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom - UK) के साथ समानांतर बातचीत चल रही है। ईयू-इंडिया फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA), जिसके जनवरी 2026 तक अंतिम रूप लेने की उम्मीद है, द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देगा और वैश्विक संरक्षणवाद के खिलाफ एक ढाल का काम करेगा। साथ ही, यह चीन से व्यापार के विचलन (diversion) में भी मदद करेगा। ईयू और यूके के साथ समझौते वैश्विक अनिश्चितता के बीच खुले व्यापार के प्रति प्रतिबद्धता दिखाते हैं और भारतीय निर्यातकों के लिए ठोस अवसर पैदा करते हैं।
हालांकि भारत-अमेरिका BTA पर बातचीत आशावाद के साथ जारी है, लेकिन अमेरिका में नीतिगत अस्थिरता को देखते हुए, भारत को कई बाजारों में अपने व्यापारिक संबंधों को मजबूत करना होगा। एक जटिल वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में नेविगेट करने के लिए घरेलू विनिर्माण (manufacturing) प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है।
