US State Department ने दुनिया भर में वीज़ा अपॉइंटमेंट्स को अस्थाई तौर पर रोक दिया है। नए इमिग्रेशन नियमों के चलते स्टाफ को ट्रेनिंग दी जा रही है और अपॉइंटमेंट्स को **1 सितंबर, 2026** के बाद के लिए री-शेड्यूल किया जा रहा है। यह फैसला भारतीय IT कंपनियों और विदेशों में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए बड़ी अनिश्चितता पैदा कर सकता है।
वीज़ा कामकाज में बड़ी रुकावट
US State Department ने अपनी एंबेसी और कॉन्सुलट में वीज़ा अपॉइंटमेंट्स की प्रक्रिया को ग्लोबल स्तर पर सस्पेंड कर दिया है। इस पॉज़ का मुख्य कारण कॉन्सुलर ऑफिसर्स को कड़ी ट्रेनिंग देना है, ताकि वे नए और सख्त इमिग्रेशन स्क्रीनिंग स्टैंडर्ड्स को लागू कर सकें। इसका मकसद उन आवेदकों की पहचान करना है जो US में सरकारी वित्तीय लाभ पर निर्भर हो सकते हैं।
IT सेक्टर के लिए चिंता की बात
भारतीय निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता IT सेक्टर को लेकर है। TCS, Infosys, Wipro, HCL Tech और Tech Mahindra जैसी बड़ी कंपनियां अपने कर्मचारियों को H-1B और L-1 वीज़ा पर प्रोजेक्ट्स के लिए अमेरिका भेजती हैं। वीज़ा स्टैम्पिंग या रिन्यूअल में देरी का मतलब है प्रोजेक्ट डिलीवरी में अड़चन। हालांकि, कंपनियां अब स्थानीय स्तर पर भी हायरिंग (Local Hiring) बढ़ा रही हैं, लेकिन इस तरह की अचानक आई बाधाएं ऑपरेशनल कामकाज को प्रभावित कर सकती हैं।
छात्रों और अन्य सेक्टरों पर असर
सिर्फ IT ही नहीं, बल्कि विदेशी शिक्षा लेने वाले भारतीय छात्रों के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है। फॉल एकेडमिक इनटेक की तैयारी कर रहे छात्रों के सामने लॉजिस्टिक परेशानियां खड़ी हो सकती हैं। साथ ही, एयरलाइन और ट्रैवल सेक्टर पर भी इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि वीज़ा देरी के चलते इंटरनेशनल पैसेंजर ट्रैफिक में गिरावट की आशंका बनी रहती है।
आगे की राह
निवेशकों को अब अपनी पोर्टफोलियो कंपनियों के मैनेजमेंट कमेंट्री पर नज़र रखनी चाहिए। आने वाले क्वार्टरली नतीजों के दौरान यह स्पष्ट हो पाएगा कि कंपनियां प्रोजेक्ट की निरंतरता बनाए रखने के लिए क्या रणनीति अपना रही हैं। साथ ही, यह ध्यान रखना जरूरी है कि अमेरिका का इमिग्रेशन कानून काफी वोलाटाइल है और इस तरह के प्रशासनिक बदलावों के बीच कानूनी चुनौतियां भी आती रहती हैं।
