अमेरिका ने अपने एशियाई सहयोगियों से डिफेंस पर खर्च बढ़ाने का आग्रह किया है। अमेरिकी रक्षा विभाग के अंडर सेक्रेटरी एल ब्रिज कोल्बी ने कहा है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा के लिए अब 'बर्डन-शेयरिंग' यानी जिम्मेदारी बांटने का समय आ गया है। इस कदम से डिफेंस टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग बढ़ सकती है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि आने वाले समय में इन देशों के रक्षा बजट में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
'डिटेरेंस बाय डिनायल' की नई रणनीति
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए अमेरिका अपनी रणनीति बदल रहा है। अब वह नहीं चाहता कि सिर्फ अमेरिका ही सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाए। हाल ही में मनीला दौरे पर, अमेरिकी रक्षा विभाग के पॉलिसी अंडर सेक्रेटरी, एल ब्रिज कोल्बी ने साफ किया कि अब सहयोगियों को अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा खर्च करना होगा। उनका कहना है कि वाशिंगटन 'समान साझीदारों' का एक ऐसा नेटवर्क बनाना चाहता है, जहां हर देश अपनी रक्षा के लिए ज्यादा जिम्मेदार हो।
इस नई रणनीति का एक अहम हिस्सा है 'डिटेरेंस बाय डिनायल'। इसका मतलब है कि किसी भी संभावित दुश्मन को यह अहसास कराया जाए कि हमला करना बहुत महंगा पड़ेगा और शायद नाकाम भी हो। इसी के चलते पेंटागन फिलीपींस, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों को तेजी से और बड़े पैमाने पर हथियार खरीदने की सलाह दे रहा है। डिफेंस सेक्टर पर नजर रखने वालों का मानना है कि इससे दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में मिलिट्री हार्डवेयर, साइबर सिक्योरिटी और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकारी खर्च में लगातार बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।
डिफेंस खर्च का आर्थिक असर
डिफेंस पर ज्यादा खर्च करने से अर्थव्यवस्था में अवसर और चुनौतियां, दोनों पैदा होंगी। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ सहयोगी देश अपनी जीडीपी का 3.5% तक खर्च करने का लक्ष्य बना सकते हैं। इससे दूसरी जरूरी योजनाओं जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर या सामाजिक कार्यक्रमों के लिए पैसा कम हो सकता है। वहीं, डिफेंस बनाने वाली कंपनियों के लिए यह अच्छी खबर है। ऑर्डर बढ़ने और सप्लाई चेन मजबूत होने की उम्मीद है। जिन कंपनियों की टेक्नोलॉजी या उत्पाद मिलिट्री आधुनिकीकरण में मददगार होंगे, उनकी मांग बढ़ सकती है। हालांकि, यह सब सरकारों के फैसले और अप्रूवल पर निर्भर करेगा।
खतरे और भू-राजनीतिक दबाव
निवेशकों को इस बदलाव पर नजर रखते हुए कुछ जोखिमों को भी ध्यान में रखना होगा। चीन के साथ बढ़ता तनाव और इस क्षेत्र में हथियारों की होड़ लगने का खतरा है, जिससे व्यापार और विदेशी निवेश में अस्थिरता आ सकती है। इसके अलावा, डिफेंस बजट में भारी बढ़ोतरी छोटे देशों की आर्थिक हालत पर दबाव डाल सकती है, जिससे उनका कर्ज बढ़ सकता है। इन देशों के लिए सुरक्षा के वादे और घरेलू आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती होगी।
आगे चलकर, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये सरकारें असल में कितना बजट आवंटित करती हैं और खरीद की क्या प्रक्रिया अपनाती हैं। बाजार की नजरें नए ज्वाइंट-डिफेंस प्रोजेक्ट्स, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर या बड़े इंपोर्ट डील पर होंगी, जिनसे डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स को फायदा हो सकता है। साथ ही, इन सुरक्षा गठबंधनों के कारण कूटनीतिक रिश्तों या व्यापार नीतियों में कोई भी बदलाव इस बढ़ते डिफेंस खर्च की दिशा तय करेगा।
