अमेरिका की नई पॉलिसी: भारत पर सीधा असर कम, पर लंबी अवधि में चिंता
अमेरिका ने नेशनल सिक्योरिटी (National Security) को वजह बताते हुए कुछ पेटेंट वाली फार्मा प्रोडक्ट्स पर 100% टैरिफ लगा दिया है। इस फैसले का मकसद विदेशी दवा निर्माण पर निर्भरता कम करना और मैन्युफैक्चरिंग को अमेरिका वापस लाना है। अच्छी खबर यह है कि भारत के फार्मा सेक्टर पर इसका तुरंत बड़ा असर नहीं पड़ेगा। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के मुताबिक, अमेरिका के ड्रग मार्केट का 90% से ज्यादा हिस्सा भारतीय जेनेरिक दवाओं का है। इन दवाओं पर करीब एक साल तक टैरिफ से छूट मिल सकती है, ताकि दवाओं की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी को रोका जा सके।
अमेरिका का 'प्रोटेक्शनिस्ट' रवैया और भविष्य की अनिश्चितता
यह टैरिफ अमेरिकी एडमिनिस्ट्रेशन की आक्रामक ट्रेड पॉलिसी (Trade Policy) का हिस्सा है। सेक्शन 232 (Section 232) के तहत नेशनल सिक्योरिटी का हवाला देकर, अमेरिका चाहता है कि दवा कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग अमेरिका में शिफ्ट करें। हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले से भी इस बात के संकेत मिले हैं कि अमेरिका अपनी ट्रेड पॉलिसी को लेकर और सख्त हो रहा है। यह 'प्रोटेक्शनिस्ट' एजेंडा (Protectionist Agenda) भारत जैसे देशों के लिए अनिश्चितता बढ़ा सकता है। खास बात यह है कि भारत का फार्मास्युटिकल सेक्टर (Pharmaceutical Sector) अमेरिका में 2025 में $9.7 बिलियन का एक्सपोर्ट करता है, जो उसके कुल एक्सपोर्ट का 38% है। भविष्य में अगर यह टैरिफ जेनेरिक दवाओं पर भी लागू हुए, तो भारत के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
ग्लोबल मार्केट पर असर: कौन हुआ प्रभावित?
जहां भारत की जेनेरिक दवाएं फिलहाल सुरक्षित दिख रही हैं, वहीं आयरलैंड, स्विट्जरलैंड, जर्मनी जैसे देश जो पेटेंट वाली हाई-वैल्यू दवाएं एक्सपोर्ट करते हैं, उन पर सीधा दबाव पड़ेगा। 2023 में यूरोपीय यूनियन (European Union) ने अमेरिका को करीब €92 बिलियन की मेडिसिन और फार्मा प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट किए थे। अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा ड्रग मार्केट है, जहां ग्लोबल सेल्स का आधे से ज्यादा हिस्सा आता है। इतिहास गवाह है कि अमेरिकी टैरिफ के फैसलों का भारतीय एक्सपोर्ट पर बड़ा असर पड़ा है। 2025 के मई से सितंबर के बीच, अमेरिका में भारत के कुल एक्सपोर्ट 37.5% घटे थे, जिसमें फार्मा का एक्सपोर्ट 15.7% कम हो गया था। इस तरह की वोलेटिलिटी (Volatility) से भारतीय फार्मा स्टॉक्स (Pharmaceutical Stocks) में भी गिरावट देखी गई थी। मौजूदा जियोपॉलिटिकल टेंशन (Geopolitical Tensions) और प्रोटेक्शनिस्ट पॉलिसी की वजह से ग्लोबल फार्मा सेक्टर पर लागत बढ़ने और सप्लाई चेन की दिक्कतें बढ़ सकती हैं।
भारत के एक्सपोर्ट के लिए लंबी अवधि के खतरे
फिलहाल छूट मिलने के बावजूद, अमेरिका के साथ भारत के फार्मा ट्रेड का भविष्य जोखिमों से भरा है। सबसे बड़ी चिंता अमेरिका की बदलती ट्रेड पॉलिसी है, जो सप्लाई चेन को फिर से बनाने के लिए नेशनल सिक्योरिटी रूल्स का इस्तेमाल कर रही है। GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव (Ajay Srivastava) का कहना है कि पेटेंट वाली दवाओं या स्पेशलिटी मेडिसिन के इनपुट बनाने वाली भारतीय कंपनियों पर भी टैरिफ लग सकता है। 'फिलहाल जेनेरिक दवाओं को छूट' का स्टेटस अनिश्चितता पैदा करता है, क्योंकि एक साल बाद समीक्षा में टैरिफ का दायरा बढ़ाया जा सकता है। यह भी माना जा रहा है कि कम मार्जिन वाली जेनेरिक दवाओं के लिए मैन्युफैक्चरिंग वापस अमेरिका लाना संभव नहीं है, जिससे कंपनियां मार्केट से बाहर हो सकती हैं और दवाओं की कमी बढ़ सकती है। हालिया ट्रेड डील्स (Trade Deals) के बावजूद, सेक्शन 232 और सेक्शन 301 (Section 301) का इस्तेमाल सप्लाई चेन पर कंट्रोल बनाए रखने का संकेत देता है, जिससे एक्सपोर्ट पर निर्भर देशों को नुकसान हो सकता है। इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) का मानना है कि भले ही अमेरिका से रेवेन्यू का कॉन्ट्रिब्यूशन कम हुआ हो, पर कॉन्ट्रैक्ट्स और प्राइसिंग प्रेशर (Pricing Pressure) की वजह से छोटे-मोटे झटके अभी भी लग सकते हैं।
ग्लोबल फार्मा ट्रेड का भविष्य
ये टैरिफ घोषणाएं ग्लोबल फार्मा ट्रेड में एक 'टर्निंग पॉइंट' मानी जा रही हैं, जो अब ज्यादा जियोपॉलिटिकल फैक्टर से प्रभावित इंडस्ट्रियल पॉलिसी (Industrial Policy) की ओर बढ़ रहा है। एनालिस्ट्स (Analysts) का कहना है कि भले ही मौजूदा फैसले से भारत के जेनेरिक एक्सपोर्ट पर फौरन असर न पड़े, पर बढ़ता प्रोटेक्शनिज्म एक बड़ी चुनौती बना रहेगा। इस बदलते माहौल में भारतीय फार्मा कंपनियों को लगातार नई पॉलिसी पर नजर रखनी होगी और ट्रेड टर्म्स (Trade Terms) पर बातचीत के लिए तैयार रहना होगा। अमेरिका का डोमेस्टिक प्रोडक्शन (Domestic Production) और सप्लाई चेन रेजिलिएंस (Supply Chain Resilience) पर फोकस, इंटरनेशनल मेडिसिन ट्रेड को और मुश्किल बना सकता है।