US-ईरान जंग को 6 महीने: मार्केट के रिस्क और इकोनॉमिक असर को समझें

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
US-ईरान जंग को 6 महीने: मार्केट के रिस्क और इकोनॉमिक असर को समझें

अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष के छठे महीने में प्रवेश करते ही, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप घरेलू स्तर पर **57%** विरोध का सामना कर रहे हैं, हालांकि उन्हें अपने इवेंजेलिकल बेस से मजबूत समर्थन मिला हुआ है। भारतीय निवेशकों के लिए, होर्मुज जलडमरूमध्य में लगातार व्यवधान एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय बना हुआ है, जो तेल की कीमतों में अस्थिरता और महंगाई का दबाव बढ़ा रहा है, जिससे निफ्टी और सेंसेक्स की सेंटीमेंट पर असर पड़ रहा है।

US-ईरान जंग के 6 महीने: मार्केट रिस्क और इकोनॉमिक असर

अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी जंग को आज 6 महीने पूरे हो गए हैं। इस दौरान, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को घरेलू स्तर पर 57% विरोध का सामना करना पड़ रहा है, वहीं उनके इवेंजेलिकल वोटर्स का समर्थन बरकरार है। लेकिन वैश्विक वित्तीय बाजारों और भारतीय निवेशकों के लिए, यह राजनीतिक दांव-पेंच गौण है, और असली चिंता इससे जुड़े आर्थिक जोखिमों को लेकर है।

ग्लोबल एनर्जी और महंगाई का दबाव

बाजारों के लिए सबसे बड़ी फिक्र होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी है, जो वैश्विक तेल सप्लाई का एक अहम रास्ता है। लगातार सैन्य तनाव और अमेरिकी जहाजों पर हमलों की वजह से सामान्य शिपिंग ऑपरेशन बहाल नहीं हो पा रहे हैं, जिससे ग्लोबल एनर्जी की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। भारत, जो तेल आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, के लिए लगातार ऊंचे तेल की कीमतें आर्थिक बाधा पैदा कर रही हैं। यह महंगाई को बढ़ा सकता है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के लिए मौद्रिक नीति को आसान बनाना मुश्किल हो जाएगा और ऊर्जा पर निर्भर कंपनियों के मुनाफे पर भी असर पड़ेगा।

सरकारी खर्च और मार्केट में अस्थिरता

इस संघर्ष का अमेरिका की वित्तीय स्थिति पर भी बोझ पड़ रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, 2026 में इस युद्ध के कारण अमेरिकी सरकार को $48 बिलियन से अधिक का अतिरिक्त उधार लेना पड़ा है। अमेरिका में उधार लेने की लागत बढ़ने से डॉलर मजबूत हो सकता है और वैश्विक लिक्विडिटी टाइट हो सकती है, जो ऐतिहासिक रूप से उभरते बाजारों के इक्विटी पर दबाव डालता है। भारतीय निवेशकों ने निफ्टी और सेंसेक्स की अस्थिरता में इस अनिश्चितता को महसूस किया है। जब वैश्विक जोखिम बढ़ता है, तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) अक्सर उभरते बाजारों में अपना निवेश कम कर देते हैं, जिससे सूचकांकों में तेज गिरावट आती है।

निवेशकों के लिए ध्यान देने योग्य बातें

भू-राजनीतिक परिदृश्य अप्रत्याशित बना हुआ है, जिसमें सैन्य तनाव बढ़ने या शिपिंग में और अधिक व्यवधान का खतरा है। निवेशकों को होर्मुज जलडमरूमध्य में होने वाले घटनाक्रमों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि कोई भी नई घटना कमोडिटी की कीमतों में तत्काल उछाल ला सकती है। इसके अलावा, ऊर्जा लागत से उत्पन्न होने वाली महंगाई का असर कॉर्पोरेट नतीजों में एक महत्वपूर्ण कारक बना रहेगा। हालांकि ऊर्जा मार्गों को फिर से खोलने के लिए राजनयिक प्रयास रुके हुए दिख रहे हैं, लेकिन किसी भी तरह की प्रगति या इसके विपरीत, सैन्य कार्रवाई में बड़ी वृद्धि, अमेरिकी और भारतीय शेयर बाजारों में अल्पकालिक सेंटीमेंट को प्रभावित करती रहेगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.