क्या है मामला?
अमेरिका के राजदूत सर्जियो गोर (Sergio Gor) ने व्यापार वार्ता में प्रगति का संकेत दिया था और जल्द ही भारतीय प्रतिनिधिमंडल की यात्रा की बात कही थी। लेकिन, अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के एक ऐसे फैसले ने जिसने कार्यकारी टैरिफ लगाने की शक्ति को चुनौती दी, और उसके तुरंत बाद नए ग्लोबल टैरिफ की घोषणा ने इस पूरी प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। फरवरी में हुआ वह समझौता, जिसका मकसद भारतीय एक्सपोर्ट्स को बढ़ावा देना था, अब गहरी कानूनी और नियामक अनिश्चितता का शिकार हो गया है।
टैरिफ की नई मार
पूरा मामला अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें कहा गया कि केवल कांग्रेस के पास ही टैक्स और ड्यूटी लगाने का अधिकार है। इस फैसले के बाद, अमेरिकी प्रशासन ने ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 (Section 122 of the Trade Act of 1974) के तहत तुरंत 10% का एक नया ग्लोबल टैरिफ लागू कर दिया। यह टैरिफ फिलहाल 150 दिनों के लिए अस्थायी है, जब तक कि कांग्रेस इसे आगे नहीं बढ़ाती। इस अचानक बदलाव ने भारत के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है, क्योंकि फरवरी के समझौते में कई भारतीय निर्यात पर लगने वाले टैरिफ को लगभग 50% से घटाकर 18% कर दिया गया था।
फरवरी के समझौते का भविष्य
फरवरी के व्यापार सौदे से भारत को खास तौर पर टेक्सटाइल, मशीनरी और फार्मा जैसे सेक्टरों में बड़ा फायदा मिल रहा था, जिससे भारत को बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धियों से बेहतर मुकाबले में मदद मिल रही थी। हालांकि, स्टील और एल्युमिनियम (Section 232) और कुछ अन्य वस्तुओं (Section 301) पर पहले से लगे टैरिफ बने हुए हैं, जिससे सभी सेक्टरों को पूरी तरह फायदा नहीं मिल पा रहा था। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की व्यापार नीति की अनिश्चितता भारत जैसे उभरते बाजारों को प्रभावित कर सकती है, जिससे निवेश और ग्रोथ धीमी हो सकती है।
आगे क्या?
इस लगातार बदलती नीतियों के माहौल में भारतीय निर्यातकों के लिए एक स्थिर बाज़ार तक पहुंच बनाना मुश्किल हो रहा है। जबकि राजदूत गोर प्रगति की बात कर रहे हैं, अमेरिकी व्यापार नीति की अप्रत्याशितता यह सवाल खड़े करती है कि द्विपक्षीय व्यापार समझौते कितने टिकाऊ हो सकते हैं। आने वाले दिनों में वाशिंगटन की यात्रा व्यापार वार्ता के अगले कदमों को तय करने में महत्वपूर्ण साबित होगी। भारत को शायद अपनी बातचीत की रणनीति पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है, ताकि अल्पकालिक टैरिफ सौदों के बजाय स्थायी और अनुमानित बाज़ार पहुंच सुनिश्चित की जा सके।