बातचीत की ताकत खत्म
दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर जो फ्रेमवर्क (Framework) तैयार हुआ था, वह अब लगभग खत्म हो चुका है। जो डील टैरिफ (Tariff) कम करने के लिए शुरू हुई थी, वो अब न्यायिक दखल और अनिश्चितता के कारण एक बड़े टकराव में बदल गई है। सुप्रीम कोर्ट के फरवरी 2026 के फैसले ने पुराने टैरिफ एग्रीमेंट को अवैध करार दिया, जिससे सबसे बड़ा फायदा - इंपोर्ट ड्यूटी (Import Duty) का 25% से घटकर 18% होना - खत्म हो गया। अब यह डील भारत के लिए फायदेमंद नहीं, बल्कि नुकसानदायक साबित हो सकती है।
सेक्शन 301 टैरिफ का बढ़ता खतरा
मामले को और बिगाड़ते हुए, अमेरिका के ऑफिस ऑफ द US ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (Office of the US Trade Representative) ने सेक्शन 301 के तहत 60 देशों पर जांच का शिकंजा कस दिया है। 3 जून 2026 को जारी रिपोर्ट में कथित लेबर प्रैक्टिस (Labor Practices) को लेकर भारत के सामानों पर 12.5% का अतिरिक्त टैरिफ लगाने की बात कही गई है। यह दिखाता है कि अमेरिका अब अपने ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर सख्त हो रहा है और इन्हें एकतरफा मानने लगा है। भारत के लिए यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि उसे अब $500 अरब के इंपोर्ट कमिटमेंट (Import Commitment) पर दोबारा सोचना होगा।
जोखिम का पूरा आकलन
अगर इस डील से जुड़े जोखिमों को देखें, तो सबसे बड़ा खतरा यह है कि भारत पर स्थायी रेगुलेटरी (Regulatory) और डिजिटल ट्रेड कंसेशन (Digital Trade Concessions) देने का दबाव है, जबकि बदले में उसे सिर्फ अस्थायी और आसानी से वापस ली जा सकने वाली टैरिफ राहत मिल रही है। इतिहास गवाह है कि ऐसे समझौते ज्यादा टिकते नहीं हैं। अमेरिका में डोमेस्टिक पॉलिटिकल प्रेशर (Domestic Political Pressure) अक्सर इंटरनेशनल पैक्ट (International Pact) पर हावी हो जाता है। इसके अलावा, इंडस्ट्रियल ओवरकैपेसिटी (Industrial Overcapacity) को लेकर लगातार जांच का खतरा यह दिखाता है कि एक हस्ताक्षरित BTA भी भविष्य में एडमिनिस्ट्रेटिव टैरिफ (Administrative Tariffs) से सुरक्षा नहीं दे पाएगा।
भारत के लिए आगे का रास्ता?
ऐसे हालातों में इस BTA को आगे बढ़ाना भारत के लिए काफी जोखिम भरा हो सकता है। अगले 5 सालों में $500 अरब के अमेरिकी इंपोर्ट की भारी-भरकम जरूरत रुपए पर भारी दबाव डाल सकती है, खासकर अगर टैरिफ बढ़ने के बावजूद एक्सपोर्ट वॉल्यूम (Export Volume) मजबूत बना रहता है। मार्केट डेटा (Market Data) बताता है कि पिछले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में ऊंचे टैरिफ के बावजूद भारतीय एक्सपोर्ट में कमी नहीं आई थी। ऐसे में, भारत के लिए शायद स्वतंत्र ट्रेड पॉलिसी (Trade Policy) अपनाना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है, बजाय एकतरफा, लंबी अवधि की कमिटमेंट में फंसने के। सबसे समझदारी इसी में है कि BTA को सेक्शन 301 की चर्चाओं से अलग किया जाए और इस डील को तब तक के लिए फ्रीज (Freeze) कर दिया जाए, जब तक अमेरिका की पॉलिसी स्थिर न हो जाए और इंटरनेशनल कोऑपरेशन (International Cooperation) का लीगल फ्रेमवर्क (Legal Framework) फिर से भरोसेमंद न बन जाए।
