9 सितंबर 2026 से अमेरिकी H-1B और L-1 वीज़ा एक्सटेंशन की फीस ₹4,000 और ₹4,500 तक बढ़ जाएगी। साथ ही, नई लॉटरी सिस्टम से भारतीय IT कंपनियों के लिए हायरिंग और लागत का दबाव और बढ़ेगा।
वीज़ा एक्सटेंशन पर भारी शुल्क!
अमेरिकी वीज़ा नियमों में बड़े बदलाव होने वाले हैं, जिसका सीधा असर भारतीय IT कंपनियों और वहां काम करने वाले प्रोफेशनल्स पर पड़ेगा। 9 सितंबर 2026 से H-1B वीज़ा एक्सटेंशन के लिए $4,000 और L-1 वीज़ा एक्सटेंशन के लिए $4,500 का शुल्क लागू होगा। अब तक इन एक्सटेंशन्स पर कोई शुल्क नहीं था, इसलिए यह कंपनियों के लिए एक बड़ा खर्च बढ़ने जैसा है।
वेज-वेटेड लॉटरी से हायरिंग पर असर
27 फरवरी 2026 से लागू हुई वेज-वेटेड लॉटरी सिस्टम ने H-1B वीज़ा आवंटन को पूरी तरह बदल दिया है। इस सिस्टम में, ज्यादा वेतन वाली सीनियर पोजिशन्स को लॉटरी में ज्यादा एंट्री मिलती हैं, जबकि एंट्री-लेवल जॉब्स को कम। इसका फायदा Amazon, Meta, Microsoft और Google जैसी बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियों को होगा, जो ज्यादा सैलरी देती हैं। वहीं, भारतीय IT कंपनियां, जो एंट्री-लेवल और मिड-लेवल टैलेंट पर निर्भर करती हैं, उनके लिए अपने पसंदीदा कर्मचारियों के लिए वीज़ा मिलना और मुश्किल हो जाएगा। इससे उन्हें अपनी टैलेंट एक्विजिशन की स्ट्रेटेजी बदलनी पड़ सकती है।
भारतीय IT कंपनियों के लिए वित्तीय चुनौती
इन बदले नियमों से भारतीय IT कंपनियों के बिजनेस मॉडल पर सीधा असर पड़ेगा। वीज़ा एक्सटेंशन की बढ़ी हुई फीस उनके 'कॉस्ट ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ाएगी, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है, खासकर अगर वे यह अतिरिक्त लागत अपने अमेरिकी क्लाइंट्स पर नहीं डाल पाते हैं। जूनियर से मिड-लेवल रोल्स के लिए वीज़ा मिलने में आ रही दिक्कतों के चलते, कंपनियां अब 'ऑफशोर' मॉडल पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं, यानी काम भारत या अन्य ग्लोबल सेंटरों से किया जाएगा, न कि क्लाइंट लोकेशन पर।
हालांकि, $100,000 के एक प्रस्तावित सप्लीमेंटल शुल्क को जून 2026 में अमेरिकी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने रद्द कर दिया था और जुलाई में अपील भी खारिज हो गई थी, लेकिन वीज़ा नियमों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। बेरोजगार वीज़ा होल्डर्स के लिए 60-दिन की ग्रेस पीरियड की भी कड़ी जांच हो रही है, जिससे कर्मचारियों और उन्हें स्पॉन्सर करने वाली कंपनियों, दोनों के लिए अस्थिरता बढ़ रही है।
निवेशकों को किन बातों पर रखनी होगी नज़र?
निवेशकों को प्रमुख भारतीय IT कंपनियों के आने वाले तिमाही नतीजों पर नजर रखनी चाहिए। कंपनियां ऑनसाइट हायरिंग की लागत, मार्जिन बचाने की रणनीतियों और H-1B वीज़ा पर निर्भरता के बारे में क्या कहती हैं, यह महत्वपूर्ण होगा। सबसे अहम यह देखना होगा कि क्या कंपनियां ऑनसाइट वीज़ा होल्डर्स पर निर्भरता कम करते हुए, अपनी कॉम्पिटिटिवनेस बनाए रख पाती हैं। साथ ही, इंडस्ट्री इन प्रतिबंधों के बीच टैलेंट मैनेजमेंट कैसे करती है, यह भी कंपनी की लॉन्ग-टर्म स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण फैक्टर होगा।
