अमेरिकी प्रशासन ने H-1B वीजा स्पॉन्सरशिप पर **$1,00,000** की फीस को एक और साल के लिए बढ़ा दिया है। इस कदम का मकसद थर्ड-पार्टी आउटसोर्सिंग को कम करना है। साल **2025** के बाद से रजिस्ट्रेशन में **92%** की भारी गिरावट के बाद, अब भारतीय IT कंपनियों को अपनी वर्कफोर्स रणनीति को नए सिरे से तैयार करना होगा।
अमेरिकी सरकार का यह फैसला उन भारतीय IT कंपनियों के लिए बड़ा झटका है जो अपने काम के लिए बड़ी संख्या में भारत से कर्मचारियों को अमेरिका भेजती हैं। यह पॉलिसी मुख्य रूप से उन थर्ड-पार्टी एजेंसियों पर लगाम लगाने के लिए लाई गई है, जो वीजा का भारी इस्तेमाल करती हैं।
मुनाफे पर मार और बढ़ता खर्च
इस महंगी फीस के कारण कंपनियों की ऑपरेशनल लागत में भारी बढ़ोतरी तय है। अगर कंपनियां इस खर्च को क्लाइंट्स पर नहीं डाल पाती हैं, तो इसका सीधा असर उनके EBITDA मार्जिन पर पड़ेगा। क्लाइंट्स पहले ही बजट को लेकर फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं, जिससे कंपनियों के लिए मार्जिन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।
'लोकल हायरिंग' पर बढ़ेगा जोर
इस नियम के चलते अब भारतीय IT कंपनियों को मजबूरन अमेरिका में ही स्थानीय टैलेंट को हायर करने की रफ्तार बढ़ानी होगी। हालांकि, अमेरिका में स्थानीय कर्मचारियों को भारत के मुकाबले ज्यादा सैलरी देनी पड़ती है। कंपनियां अब इस बैलेंस को साधने की कोशिश कर रही हैं कि वीजा फीस बचाएं या अमेरिका में बढ़ती सैलरी कॉस्ट को अपनाएं।
नई प्रशासनिक मुश्किलें
अब वीजा प्रोसेस और जटिल हो गया है। अमेरिकी प्रशासन ने डिपार्टमेंट ऑफ लेबर, डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट और डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी के डेटाबेस को आपस में जोड़ने का आदेश दिया है। अब नए वीजा आवेदनों की तुलना अमेरिकी कंपनियों के 'ले-ऑफ डेटा' से की जाएगी। यदि किसी कंपनी ने हाल ही में अमेरिका में अपने कर्मचारियों की छंटनी की है, तो उनके नए वीजा आवेदनों को कड़ी स्क्रूटनी (जांच) का सामना करना पड़ेगा, जिससे प्रोजेक्ट्स में देरी का रिस्क भी बढ़ गया है।
