अमेरिका और चीन ने अपने द्विपक्षीय ट्रेड ट्रूस (Trade Truce) को **10 जनवरी 2027** तक के लिए बढ़ा दिया है। इस डील के तहत **$30 बिलियन** के सामान पर टैरिफ में कटौती का फ्रेमवर्क तैयार किया गया है, लेकिन रीयल-अर्थ मिनरल्स और टेक्नोलॉजी रेगुलेशन जैसे मुद्दे अभी भी बाजार के लिए जोखिम बने हुए हैं।
अमेरिका और चीन के बीच हुई हालिया कूटनीतिक बातचीत के बाद दोनों देशों ने 10 जनवरी 2027 तक ट्रेड ट्रूस को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। यह समझौता सितंबर 2026 के अंत में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वॉशिंगटन यात्रा के बाद हुआ है। इस डील के तहत दोनों देशों ने '30-फॉर-30' टैरिफ रिडक्शन फ्रेमवर्क तैयार किया है, जिसमें करीब $30 बिलियन के ट्रेड पर टैरिफ में कटौती की जाएगी। हालांकि, यह शांति कुछ समय के लिए राहत जरूर दे रही है, लेकिन गहरे स्ट्रैटेजिक विवाद अभी भी सुलझने बाकी हैं।
मार्केट के लिए क्या हैं जोखिम?
ट्रेड ट्रूस के बावजूद, कुछ अहम मुद्दे निवेशकों की चिंता बढ़ा रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती रीयल-अर्थ (Rare Earth) मिनरल्स की सप्लाई चेन पर नियंत्रण है। चीन का इन मिनरल्स की माइनिंग और प्रोसेसिंग पर दबदबा है, जो इलेक्ट्रॉनिक्स और डिफेंस सेक्टर के लिए बेहद जरूरी हैं। सप्लाई चेन में किसी भी तरह का व्यवधान ग्लोबल टेक और मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए बड़ा रिस्क है। साथ ही, ताइवान का मुद्दा, AI रेगुलेशन और टेक्नोलॉजी पर पाबंदियां भी ग्लोबल मार्केट की अस्थिरता को बनाए हुए हैं।
निवेशकों के लिए संकेत
भारतीय निवेशकों के नजरिए से देखें तो अमेरिका-चीन के ये संबंध ग्लोबल कमोडिटी की कीमतों और करेंसी ट्रेंड्स पर सीधा असर डालते हैं। आने वाले समय में निवेशकों की नजर अब इंटरनेशनल इवेंट्स पर है। नवंबर 2026 में शेनझेन में होने वाला APEC समिट और दिसंबर 2026 में मियामी में होने वाला G20 समिट काफी अहम रहेंगे। इन इवेंट्स में ट्रेड पॉलिसी और एक्सपोर्ट कंट्रोल्स पर होने वाली चर्चा यह तय करेगी कि आगे मार्केट की दिशा क्या होगी। तब तक बाजार 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में ही रहेगा।
