संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अमेरिका की थर्ड-कंट्री डिपोर्टेशन पॉलिसी का कड़ा विरोध किया है। अब तक **23,000** से ज्यादा लोगों को दूसरे देशों में भेजा जा चुका है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दी है।
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अमेरिकी सरकार को एक औपचारिक चेतावनी जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि उन प्रवासियों को तीसरे देशों में भेजना, जिनसे उनका कोई पुराना संबंध नहीं है, मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन को जन्म दे सकता है। इसमें टॉर्चर, दुर्व्यवहार और जबरन गायब करने जैसी गंभीर घटनाएं शामिल हो सकती हैं।
आंकड़ों में समझें स्थिति
यह प्रशासनिक नीति 2025 की शुरुआत से लागू है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक कम से कम 23,000 लोगों को 29 अलग-अलग क्षेत्रों में भेजा जा चुका है। ये लोग कुल 35 देशों के साथ हुए समझौतों के दायरे में आते हैं। जानकारों का कहना है कि ये ट्रांसफर अंतरराष्ट्रीय कानून के 'Non-refoulement' सिद्धांत का उल्लंघन हो सकते हैं, जो किसी भी शरणार्थी को उस क्षेत्र में भेजने से रोकता है जहाँ उन्हें खतरा हो।
अदालती विवाद और मौजूदा स्थिति
सितंबर 2026 में मामला तब और पेचीदा हो गया जब मैसाचुसेट्स की एक निचली अदालत ने इन निर्वासन (deportations) पर अस्थायी रोक लगा दी थी। हालांकि, 29 सितंबर, 2026 को अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने एक स्टे (stay) ऑर्डर जारी किया, जिससे सरकार को कानूनी लड़ाई जारी रहने के बावजूद प्रवासियों को भेजने की छूट मिल गई है।
कूटनीतिक और वैश्विक जोखिम
यह नीति विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों और तस्करी के पीड़ितों जैसे कमजोर समूहों पर भारी पड़ रही है। एक्सपर्ट्स को डर है कि जिन देशों में इन लोगों को भेजा जा रहा है, वहां उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिल पाएगी। यह मुद्दा अब अमेरिका और अन्य मेजबान देशों के बीच कूटनीतिक तनाव का बड़ा कारण बनता जा रहा है। वैश्विक स्तर पर निवेशकों और विश्लेषकों की इस मामले पर पैनी नजर है, क्योंकि इस तरह के विवाद अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीतिक संबंधों की स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।
