फंड की कमी से जलवायु सुरक्षा पर खतरा
जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों की मदद के लिए बनाया गया UN का फंड फॉर रेस्पॉन्डिंग टू लॉस एंड डैमेज (FRLD) पैसों की भारी कमी से जूझ रहा है। दुनियाभर के 200 से ज्यादा संगठनों ने चिंता जताई है कि विकसित देशों से नया पैसा नहीं मिला तो यह फंड 2027 तक खत्म हो सकता है। मार्च 2026 तक, इस फंड के लिए कुल करीब $822 मिलियन (लगभग ₹68,000 करोड़) का वादा किया गया था, लेकिन इसमें से सिर्फ $448 मिलियन (लगभग ₹37,000 करोड़) ही जमा हुए हैं। यह अनुमानित वार्षिक जरूरत, जो 2035 तक $400 बिलियन (लगभग ₹33 लाख करोड़) तक पहुंचने की उम्मीद है, का एक बहुत छोटा हिस्सा है। इस फंड की कमी से भारत जैसे देशों को जलवायु के अनुकूल ढलने (climate adaptation) और आपदाओं के बाद उबरने (recovery) में मिलने वाली अहम सहायता खतरे में पड़ सकती है। भारत खुद जलवायु परिवर्तन के मामले में नौवें स्थान पर है और पिछले तीन दशकों में चरम मौसम की घटनाओं से लगभग $170 बिलियन (लगभग ₹14 लाख करोड़) का नुकसान झेल चुका है। फंड की कमी को दूर करने के लिए 22-24 अप्रैल, 2026 को जाम्बिया में हुई FRLD बोर्ड की बैठक में पैसे जुटाने की रणनीतियों पर चर्चा हुई।
नए फाइनेंस के आइडियाज पर राजनीतिक अड़चनें
पैसों की इस भारी कमी को पाटने के लिए नए वित्तीय साधनों (financial tools) पर विचार किया जा रहा है। इनमें जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) के निष्कर्षण पर टैक्स, कंपनियों के अचानक हुए बड़े मुनाफे पर टैक्स और वित्तीय लेनदेन (financial trades) पर टैक्स शामिल हैं। अकेले वित्तीय लेनदेन पर लगने वाले टैक्स से सालाना $650 बिलियन (लगभग ₹54 लाख करोड़) जुटाए जा सकते हैं। हालांकि, इन्हें लागू करने में बड़ी राजनीतिक बाधाएं हैं। कुछ G20 देशों ने ट्रांजेक्शन टैक्स लगाए हैं, लेकिन वैश्विक स्तर पर इस पर सरकारों की इच्छाशक्ति की कमी के कारण कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है। इन तरीकों की सफलता इन चुनौतियों पर काबू पाने पर निर्भर करती है, खासकर जब विकासशील देशों को 2030 तक सालाना $100 बिलियन (लगभग ₹8.3 लाख करोड़) से अधिक की नुकसान और क्षति की जरूरत का अनुमान है। फिलहाल, विकासशील देशों को एडैप्टेशन प्रोजेक्ट्स के लिए सालाना करीब $32.4 बिलियन (लगभग ₹2.7 लाख करोड़) मिल रहे हैं, जो सालाना $215 बिलियन (लगभग ₹18 लाख करोड़) से $359 बिलियन (लगभग ₹30 लाख करोड़) की जरूरत से बहुत कम है। फंड की शुरुआती $250 मिलियन (लगभग ₹21,000 करोड़) की सीमा स्पष्ट रूप से अपर्याप्त है।
फंड के अप्रभावी (Ineffective) होने का खतरा
FRLD की वर्तमान वित्तीय स्थिति इसके दीर्घकालिक अस्तित्व पर गंभीर सवाल खड़े करती है। COP27 में स्थापित होने और COP28 में चालू होने के बावजूद, वादों और भुगतान की गई राशि के बीच एक विशाल अंतर है। विकासशील देशों का कहना है कि $788.68 मिलियन (लगभग ₹65,000 करोड़) के वादे से केवल $348 मिलियन (लगभग ₹29,000 करोड़) ही उपलब्ध हो पाए हैं, जिससे अपेक्षित धनराशि में भारी कमी आई है। कार्यकर्ता इस स्थिति को विश्वासघात बता रहे हैं, उनका कहना है कि अमीर देश युद्धों के लिए अरबों डॉलर ढूंढ लेते हैं, लेकिन जलवायु संकट के लिए जेब खाली होने का बहाना बनाते हैं। यह स्पष्ट जोखिम है कि FRLD एक 'खोखला तंत्र' (hollow mechanism) बनकर रह सकता है, जिसके पास अपना काम करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं होगा, खासकर जब जलवायु प्रभाव बढ़ रहे हैं और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice) द्वारा पुष्टि किए गए नुकसान और क्षति के वित्तपोषण (finance) के कानूनी कर्तव्यों को पूरा नहीं किया जा रहा है। इसके अलावा, गैर-वित्तीय नुकसानों (non-financial losses) का मूल्यांकन करने में कठिनाई और यह संभावना कि फंड को अनुदान (grants) के बजाय ऋण (loans) के रूप में दिया जा सकता है, व्यावहारिक कठिनाइयों को और बढ़ाते हैं।
भविष्य का दृष्टिकोण: फंड की राशि सबसे महत्वपूर्ण
FRLD बोर्ड वर्तमान में बारबाडोस कार्यान्वयन तौर-तरीकों (Barbados Implementation Modalities) को लागू करने और अधिक धन जुटाने की रणनीति विकसित करने पर केंद्रित है। हालांकि, दाताओं द्वारा किए जाने वाले वादों में बड़े बदलाव और नए, बड़े पैमाने पर धन जुटाने के तरीकों की शुरुआत के बिना, जलवायु संकट से निपटने की फंड की क्षमता बहुत सीमित होगी। चुनौती का पैमाना—प्रति वर्ष सैकड़ों अरबों की आवश्यकता—वादा की गई राशि से कहीं अधिक प्रतिबद्धताओं की मांग करता है। जलवायु एडैप्टेशन और लचीलापन (resilience) में निवेश अपने लागत से दस गुना तक लाभ दे सकता है, लेकिन यह पर्याप्त धन पर निर्भर करता है। FRLD के लिए धन की निरंतर कमी वैश्विक स्तर पर लचीलापन बनाने के प्रयासों को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, खासकर सबसे कमजोर अर्थव्यवस्थाओं और प्रकृति पर निर्भर उनके महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए।
