जुलाई 2026 में UK-India ट्रेड डील लागू होने के बाद, अब ब्रिटिश प्रतिनिधिमंडल भारत के साथ खाद्य और पेय पदार्थों के एक्सपोर्ट पर लगी गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने के लिए बातचीत कर रहा है। हालांकि टैक्स कम हो गए हैं, लेकिन जटिल नियमों के कारण मांस और डेयरी उत्पादों की सप्लाई में अभी भी दिक्कतें बनी हुई हैं।
ब्रिटिश सरकार का एक हाई-लेवल ट्रेड डेलीगेशन इस समय भारत के दौरे पर है। एंजेला ईगल (सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर एनवायरनमेंट, फूड एंड रूरल अफेयर्स) की अगुवाई में यह मिशन उन रेगुलेटरी चुनौतियों को सुलझाने पर केंद्रित है, जो 15 जुलाई 2026 को लागू हुई UK-India कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) के बाद भी बरकरार हैं।
असली चुनौती: टैरिफ नहीं, 'नॉन-टैरिफ' बैरियर
डील के बाद टैरिफ तो कम हुए हैं, लेकिन ब्रिटिश एक्सपोर्टर्स के लिए मांस, डेयरी और स्पिरिट्स जैसे उत्पादों को भारत भेजना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इंटरनेशनल ट्रेड की भाषा में 'नॉन-टैरिफ' बाधाओं का मतलब उन कड़े नियमों, सर्टिफिकेशन और कागजी कार्रवाई से है, जो सीमा शुल्क से अलग होते हैं लेकिन माल की आवाजाही को धीमा कर देते हैं।
व्यापार में तेजी, लेकिन तकनीकी अड़चनें
आंकड़े बताते हैं कि CETA लागू होने के बाद अगस्त 2026 में द्विपक्षीय व्यापार में 15.08% की सालाना बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अब सरकारें अपना ध्यान टैरिफ कम करने से हटाकर इन टेक्निकल दिक्कतों को दूर करने पर लगा रही हैं, ताकि व्यापार में आई तेजी बरकरार रहे।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
भारत में प्रीमियम फूड और बेवरेज सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है। Ben’s Cookies जैसे इंटरनेशनल ब्रांड्स पहले ही दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में अपना विस्तार शुरू कर चुके हैं, जो आयातित प्रीमियम प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग को दिखाता है। हालांकि, निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड्स और ग्लोबल फ्रेट कॉस्ट का दबाव व्यापार के मुनाफे पर असर डाल सकता है। आगे चलकर दोनों देश सालाना डेटा एक्सचेंज के लिए एक मैकेनिज्म बनाएंगे, जो रेगुलेटरी माहौल को और आसान बना सकता है।
